Appendix(अपेंडिक्स) के Symptom-लक्षण-cause-treatment-उपचार

 

  • Appendix(अपेंडिक्स)

पेट हमारा पाचन तंत्र  से लेकर शरीर के हर गतिविधियों में संतुलन बनाने का कार्य करता हैI अपेंडिक्स के मामले में दोनों हाथ और उनके अंदर की मालिका दीवारों में सूजन और कई प्रकार के अधिकारी उत्पन्न होती हैं जिससे रोगी को बहुत प्रकार के परेशानियां उत्पन्न होती हैI  यह मूल रूप से गंदे और शरीर के अनुकूल खाद्य पदार्थों के सेवन ना करने से होता है I अपेंडिक्स में ही नहीं बल्कि पेट के आंतरिक गतिविधियों में थोड़ी भी समस्या या लक्षण दिखाई देने पर व्यक्ति को डॉक्टर को दिखाना चाहिए क्यूंकि यह पूरी तरह से आंतरिक बीमारी है बीमारी को नियंत्रित करने के लिए  विशेषज्ञ डॉक्टर से ही परामर्श लेना सर्वोत्तम है I आधुनिक युग में अपेंडिक्स एक आम समस्या हो चुका है जो काफी कष्टकारी भी है अपेंडिस रोगी के रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ने से वो धीरे धीरे अन्य बीमारियों से भी ग्रसित हो जाता है इसलिए अपेंडिक्स से बचाव के लिए समय पर ही लक्षण पहचान कर उपचार करवाना यह एकमात्र उपाय हैं विशेषज्ञ बताते हैं शुरुआती लक्षणों में यदि अपेंडिस की पहचान हो जाए तो संपूर्ण इलाज काफी कम समय में हो जाता है जिससे इस पर पूरी तरह से नियंत्रित किया जा सकता है

  • अपेंडिक्स क्या है?(What is Appendix)? 

अपेंडिक्स (Appendix ) हमारे शरीर का आंतरिक अंग है जो पेट के अंदर बड़ी आंत और छोटी आंत के जंक्शन में पेट के निचले हिस्से में  दाहिनी तरफ होता हैIपेट का निचला दाहिना हिस्सा जहँ पैर का जोड़(joint)है उस जगह पर अगर दर्द का आभास होता है तो ये (appendicits)एपिन्डिसाइटिस  का लक्षण हो सकता हैI एपिन्डिसाइटिस(आंत्रपुच्छ) अपेंडिक्स के दर्द को कहा जाता हैI अपेंडिक्स की आकृति झिल्लीनुमा होता हैI यह बड़ी आंत से परस्पर जुड़ा होता हैI अपेंडिक्स शरीर में  सेलुलोज को पचाने में सहायक होता हैI अपेंडिक्स का एक सिरा खुला होता है और दूसरी बंद होता हैI कई बार भोजन का कोई कण इसमें चले जाता है तो दूसरे सिरे को ब्लॉक होने के कारण दूसरी ओर से  निकल नहीं पाता जिसके परिणामस्वरूप अपेंडिक्स संक्रमित हो जाता है इसमें बैक्ट्रिया कीटाणु और सड़न पैदा होने लगती है जिसे चिकित्सीय भाषा में एपिन्डिसाइटिस कहा जाता हैI इस रोग का असर 10 वर्ष से 35 वर्ष तक के लोगों में  अधिकतर देखने को मिलती हैI जिंदा खाना-पीना शुद्ध नहीं होता है अर्थात वह बाहरी भोजन और जंग फूड चाइनीज फूड आदि जैसे खाद्य पदार्थ को ज्यादा अपने आहार में शामिल करते हैं तो उनमें अपेंडिक्स होने की आशंका हमेशा बनी रहती हैI अपेंडिक्स की शरीर में भूमिका क्या है ऊपर अभी चिकित्सा विज्ञान में पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं  हुआ हैI इसका आकार अलग -अलग रोगियों में अलग-अलग आकृति होती हैIपर अधिकांशत: 9 c.m इसकी लम्बाई होत्ती है परन्तु इसकी लम्बाई कम से कम 2 c.m से लेकर 20 c.m तक देखने को मिलती हैI अपेंडिक्स का (diameter) 6mm होता हैI अपेंडिक्स का दर्द विशेष रूप से पहचान में नहीं आता अचानक काफी कठिन होता है क्योंकि यह अपेंडिक्स का दर्द है कि नहीं पेट में विभिन्न कारणों से दर्द उत्पन्न हो सकता  है जिनमें अशुद्ध भोजन और अन्य वजहों के कारण भी होता हैI  

  • अपेंडिक्स के प्रमुख लक्षण -(Symptomps of Appendix)

अगर हम इन लक्षणों  की जानकारी ना हो तो अपेंडिक्स बीमारी को पहचानना थोड़ा कठिन हो जाता है

  • पेट में  जहाँ भी इन्फेक्शन होता है तो उसके कारण तेज दर्द होता हैI 
  • जी मचलना और उल्टी आना 
  • पेट में भारीपन और गैस महसूस होना
  • बुखार और सिर में तेज दर्द होना 
  • भूख न  लगना और कमजोरी का आभास होनाI 
  • कफ युक्त मल आता हैI 
  •  नब्ज में ऐंठन और कब्ज का समस्या रहनाI 
  • कई बार अपेंडिक्स में मूत्राशय की समस्या भी देखने को मिलती है अगर मुद्रास है अपेंडिसेज संक्रमित हो तो बार-बार  पेशाब लगता है और पेशाब करते समय दर्द का आभास भी होता हैI 
  • अपेंडिक्स  रोग में होने वाली प्रमुख जांचे –

अपेंडिक्स रोग में सर्वप्रथम Physically Examination  किया जाता है जिसमें शरीर के परिवर्तन सूजन ,बाहरी चोट आदि की जांच की जाती हैI इसके अलावा खून की जांच  करवाया जाता है जिनमें खून के अंदर इन्फेक्शन तो नहीं,CBC ,अल्ट्रासाउंड,CT SCAN आदि प्रमुख जांचें करवाई जाती हैI

  • अपेंडिक्स के प्रकार(Types of Appendix)-

अपेंडिक्स मुख्यतः दो प्रकार के होते हैंI (1) एक्यूट अपेंडिक्स (2)क्रोनिक अपेंडिक्स 

  •  एक्यूट अपेंडिक्स-  इसमें  अपेंडिक्स की आकर  तेजी से फैलता और बढ़ता है  जिस समय निरोगी इस अपेंडिक्स से ग्रसित हो जाता है तो उसे कब्ज ,उल्टी,जी मचलना  आदि कई प्रकर की परेशानियों का सामना करना पड़ता हैI 
  • क्रोनिक अपेंडिक्स –इस तरह के अपेंडिक्स बहुत कम देखने को मिलते हैं अर्थात इसके रोगी काफी कम पाए जाते हैं कुछ समय बाद स्वता ही समाप्त हो जाता है इनमें पेशाब करते समय दर्द, ठंडा लगना और शरीर कांपना, पेट में गैस और गांव,  बुखार लगना,भूख न लगना आदि लक्षण देखने को मिलती हैI 
  • अपेंडिक्स  रोग होने का मुख्य कारण(cause)-

बाजारू चीज और लापरवाही भरी दिनचर्या के कारण अपेंडिक्स का प्रकोप  अधिक बढ़ा है जिससे हर उम्र के लोग प्रभावित हो रहे हैं I चाहे वह बुजुर्ग, स्त्रियां हों या बच्चेI अपेंडिक्स बढ़ाने में  रसायन युक्त भोजन और ध्रुव के साथ-साथ वायु प्रदूषण का भूमिका है

  • अगर आप किसी  पेट से संबंधित  या फेफड़े से संबंधित किसी रोक से ग्रसित हैं तो अपेंडिक्स  होने का चांस अधिक रहता हैI 
  •  इसके अलावा अगर लंबे समय तक कब्ज, खांसी हो तो अपेंडिक्स का कर्क बन सकता हैI 
  •  पेट में  पलने वाला  परजीवी(Parasite) और आंतों के अन्य समस्या से अपेंडिक्स हो सकता हैI 
  •    रेशेदारयुक्त  भोजन ना करना
  •  बाजारु और रिफाइनयुक्त खाद्य  पदार्थों का अधिक मात्रा में सेवन इनफेक्शन होने का डर रहता हैI
  • अपेंडिक्स का घरेलू उपचार-

अपेंडिक्स  एक बीमारी ऐसी है जिसमें अधिकांश था सर्जरी करवानी पड़ती है यह उस अंग को बाहर निकलवा दिया जाता है परंतु सही खान-पान और सही देखभाल से इस रोग को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है इसलिए सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए इस बीमारी से निजात पाने के लिए नीचे दिए गए इन बातों को हमेशा अपने दिनचर्या में शामिल करें

  • इसके मरीजों को खानपान में काफी विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है ,हमेशा रेशेदारयुक्त भोजन और घर का खाना  जिनमें रसायन की मात्रा काफी कम हो वैसी भोजन हमेशा करनी चाहिएI
  •  प्रदूषण से बचें ,धूल ,धुंए के संपर्क से हमेशा दूर रहने को  कोशिश करें क्योंकि प्रदूषण ना सिर्फ फेफड़े बल्कि हमारे आँतों और पेंटो को अत्यधिक हानि पहुंचाते हैं जिसके कारण अपेंडिक्स भी हो सकता हैI  
  •  अपेंडिक्स में रोज नमक मिलाकर छाछ पीना फायदेमंद होता हैI 
  •  डेयरी  प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल न करेंI 
  •  खाना धीरे-धीरे चबाकर खाएं
  •  ताजे फल और हरी पत्तेदार सब्जियां अधिक मात्रा में शामिल करेंI 
  • एलर्जी से बचने की कोशिश करेंI 
  •   अदरक अपेंडिक्स में दर्द और सूजन को दूर करने में उपयोगी है इसलिए उसका इस्तेमाल चाय और अन्य तरीके से  अपने आहार में उपयोग जरूर करेंI 
  •  पुदीना तुलसी का पत्ता और शहर का उपयोग निरंतर करना चाहिएI  विटामिन बी के साथ अन्य मिनरल्स होते हैं जो की छाती में जकड़न खास ही आदि की समस्या को दूर करने में काफी उपयोगी साबित होते हैंI 
  •  इसके अलावा द्वारा बताई गई दवाइयों का नियमित रूप से लेंI 
  •  हल्का व्यायाम और योगा अवश्य करेंI 
  • नोट -इस लेख में उपरोक्त लिखी गई बातें अर्थात चिक्तिसकीय आलेख लोगों की  स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने बीमारी के बारे में अवगत कराने के लिए हैI  जो इलाज की पुष्टि नहीं करता हैI इसलिए उपरोक्त लिखी गए लक्षण होने पर से संपर्क करें और नियमित रूप से इलाज करवाएंI 

 

नपुंसकता(IMPOTENCY) के Symptom-लक्षण-cause-treatment-उपचार

 

  • नपुंसकता(IMPOTENCY)

 आज के भाग- दौड़ भरी और प्रतिस्पर्धावाद वाली जिंदगी में इंसान के पास इतना भी समय नहीं है की वह कुछ पल परिवार और दोस्तों  के साथ बिताएं ,वो अपने करियर ,भविष्य (JOB)को लेकर इतने गंभीर होते हैं की पर्याप्त मात्रा में ना नींद ले पाते हैं ,ना ही उचित भोजन,व्यायाम और योग के लीये भी समय नहीं अर्थात   सभी लोग आर्थिक रूप से सक्षम और प्रभावशाली बनने की अभिलाषा में अपने शरीर का भी ख्याल नहीं रख पातेI जिसके कारण कई तरह के समस्याओं का सामना करना पड़ता हैI विशेषकर युवाओं में शारीरिक विकार अधिक  देखने को मिलती हैI आधुनिक युग में अभिभावकों द्वारा महत्वाकांक्षी सपनों को पाने के लिए शुरू से ही बेहतर शिक्षा का दबाव डाला जाता है उसके बाद जैसे ही बचपन से युवा की उम्र में लोग प्रवेश करते हैं उनमें स्वत: अपने कैरियर को लेकर और अभिभावकों के अधिक अपेक्षा के कारण चिंता ग्रस्त हो जाते हैं, जिसके  कारण अनेक प्रकार के मानसिक दबाव और बीमारियां उत्पन्न होती है जो शारीरिक और मानसिक रूप से शरीर को दुर्बल बना देती हैIइस प्रकार के जीवन शैली में आए बदलाव के कारण और कैरियर बनाने के चक्कर में लोग आजकल काफी देर से शादी कर रहे हैं इसके अलावा शुद्ध खानपान न होने से शारीरिक बदलाव एक बड़ी समस्या बनती जा रही हैI  जो कई तरह के रोको जन्म दे रहा है उन्हीं रोगों में से नपुंसकता हैI भारत में इन्हीं बल्कि पूरे विश्व में यौन संबंधी समस्याएं काफी तेजी से बढ़ रहे हैं जिसके कारण डिप्रेशन और पति पत्नी के मधुर पवन बर्बाद हो जा रहे हैं इसलिए हमें अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग और जागरूक रहना होगा अगर हम समयानुसार हर दिनचर्या की  कार्य करें इस प्रकार के गुप्त रोगों से छुटकारा पाया जा सकता हैI नपुसंकता हालाकी एक सामान्य समस्या है पर अधिकांश लोग इस बीमारी को लेकर खुलकर बात नहीं करते और ना ही बेहतर इलाज या उपचार करवाते हैं जबकि सबसे अधिक संवेदनशील हमें अपने गुप्तांगों के प्रति ही रहनी चाहिएI 5 वर्ष पहले किए गए एक सर्वे के अनुसार नपुसंकता अधिकतम  40 वर्ष से अधिक उम्र वाले लोगों में अधिक देखने को मिलती है,परन्तु नेशनल हेल्थ सर्विस द्वारा हाल ही में किये गए सर्वे में युवाओं में नपुंसकता की बिमारी तेजी से फ़ैल रहा हैI

  • नपुंसकता क्या है?  

नपुंसकता(Impotence) एक ऐसी बिमारी है जिसमें कोई पुरुष अपने पार्टनर(महिला) के साथ सन्तुष्टपूर्वक अंतरंग(शारीरिक) सबंध नहीं बना पता हैI दूसरे अर्थ में कहा जाये तो ऐसी परिस्थितियां जिसमें इंसान सेक्स के प्रति शारीरिक और मानसिक रूप से उतना उत्साहित नहीं रहता वह यौन क्रिया का आनंद नहीं ले पाता हैI नपुंकता से ग्रसित पुरुष जब अपने लाइफ पार्टनर के साथ शारीरिक सबंध (सेक्स) बनाता  है तो उनके लिंग में पर्याप्त तनाव और कड़ापन की कमी पायी जाती है जिसके बाद सही तरीके से सहवास(sex) न कर पाते हैं I नपुंसकता में अलग-अलग लोगों को अलग -अलग तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता हैIकुछ लोगों की लिंग में इतनी शिथिलता आ जाती है की उनको संभोग(sex) के प्रति किसी प्रकार के उत्साह नहीं रहती वो पूरी तरह इसके प्रति उदासीन हो जाते हैं उनके लिंग में किसी प्रकार की प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलतीI इस रोग से ग्रसित व्यक्ति महिला के संपर्क में आने से झिझिकते हैंIनपुंसकता को नामर्दी (Eractile dysfunction) भी कहा जाता हैI सबसे अधिक लोग  डिप्रेशन का शिकार नपुंसकता की वजह से होते हैंI कुछ लोगों के अंदर इतनी कमजोरी आ जाती है उनके लिंग में किसी तरह के तनाव महसूस नहीं होता और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके लिंग के अंदर तनाव रहता है पर लम्बे समय तक संतुलित नहीं रख पातेI सेक्स मात्र एक क्रिया बल्कि हम कह सकते हैं ली हमारे ऊर्जा और शक्ति का स्टोर हाउस है, नपुंसकता से ग्रसित कुछ पुरुषों की लिंग में उत्तेजना स्पर्श से भी नहीं होती अर्थात वैसे लोगों के लिंग में खून का संचरण उतनी नहीं होती और उत्तेजना के लिए जरुरी हारमोन भी नष्ट हो जाता हैI विशेष कर पुरुषों में 55 वर्ष के बाद और महिलाओं में 45 साल के बाद हार्मोन की कमी देखि जाती है जिसे धीरे -धीरे उनके सम्भोग की चाहत ख़त्म होने लगती है जिसके कारण मानसिक दबाव महसूस करते हैं  उनकी आत्मविश्वास में कमी देखने को मिलती है और धीरे -धीरे नपुंसकता के गिरफ्त में आ जाते हैंI 

  •  नपुंसकता के मुख्य कारण(Cause of Impotency)-

 नपुंसकता के बारे में डॉक्टरों को कहना है की अधिकतर लोगों को शारीरिक रूप से कोई समस्या नहीं होती  बल्कि अपने मन में मानसिक धारणा बना लेते हैं एक या दो बार संतुष्टपूर्वक संभोग नहीं कर पाते हैं तो स्वत: दबाव महसूस करते हैं मैं नामर्द हो गया हूँ जबकि यह एक दिमागी वहम हैI  परन्तु कुछ लोग  सही मायनों में नपुंसकता से ग्रसित होते हैं

  •  वैसे लोग  जो अपने प्रोफेशनल और कैरियर को लेकर कहीं ना कहीं मानसिक दबाव में रहने के कारण  या निजी जिंदगी में किसी कारण से मानसिक रूप से मजबूत नहीं है उनमें नपुसंकता के लक्षण आ जाते हैंI
  • हार्मोनल असंतुलन के कारण अर्थात  वैसे पुरुष जिनके अंदर टेस्टोस्टेरोन (Male Sex  Harmone) लेवल में कमीI 
  • अगर आप अधिक मोटा है तो  नपुंसकता का सामना करना पड़ सकता हैI 
  • वैसे लोग जो पहले से ही किसी अन्य बीमारीयों  से ग्रसित हों जैसे कि डायबिटीज ,दिल संबंधी, पेट संबंधी या  शरीर के आंतरिक बीमारियों से ग्रसित हो तो इसके कारण भी नपुसंकता का सामना करना पड़ सकता हैI 
  •  अधिक दवाइयों के सेवन करने और शारीरिक क्रियाकलाप जैसे कि  कोई खेल ना खेलना ,व्यायाम, योगा ना करने से भी शारीरिक समस्याएं उत्पन्न होती है जिसके कारण नपुंसकता का सामना करना पड़ सकता हैI  
  •  मसालेदार ,चाईनीज फ़ूड , जंक फ़ूड और  अधिक रिफाइनयुक्त भोजन करने से भी नपुंसक हो सकते हैंI 
  • अगर खास कर युवा जो किसी  प्रकार के नशाखोरी करते हैं शराब, सिगरेट ,गुटका  और धूम्रपान करते हैं तो यह आदत नपुसंकता बढ़ाने में मुख्य कारणों में से एक हैI 
  • अधिक हस्तमैथुन(Masturbation) के कारण शुक्राणुओं में कमी आ जाती है जिसके कारण  नपुंसकता होता हैI
  • हाइपरटेंशन के कारण ,थायरॉइड से ग्रसित व्यक्ति को भी नपुंसकता हो सकती हैI 
  • नपुंसकता के  प्रमुख लक्षण-

हमारे समाज में मुख्यत:  देखा जाता है कि लोग गुप्त यौन संबंधी बीमारियों के बारे में किसी से जिक्र करने से भी कतराते हैं उन्हें लगता है उनके   पुरुषार्थ को लोग मजाक बनाएंगे और नैतिक रूप से भी सेक्स जैसी संदर्भ के बारे में सार्वजनिक रूप से बात करना भी उचित नहीं समझा जाताI बहुत सारे लोगों को अगर लक्षण (पहचान) मालुम हो तो कीसी तरह के शारीरिक परिवर्तन  होने पर सेक्स से जुडी विकार को जान सकते हैं और नियमित रूप से इलाज करवा कर हम नपुंसक होने से बच सकते हैंI

  • नपुंसकता से ग्रसित व्यक्ति हमेशा चिचिड़ापन ,मानसिक तनाव और आत्मविश्वास की कमी रहती हैI 
  • लिंग में तनाव की कमी या बिलकुल भी तनाव ना होनाI 
  • सम्भोग के समय लिंग में तनाव खत्म हो जाना जिसके कारण सही तरीके से यौन  क्रियाएँ न कर पानाI 
  • नपुंसकता के दौरान पुरुष के लिंग में कठोरता या तो आती है नहीं तो बहुत जल्द शांत हो जाती है अर्थात कठोरता आने पर भी लिंग खड़े होने पर भी अति शीघ्र पतन हो जाना नपुंसकता के लक्षण हैI 
  • संभोग करने से पहले या इमरान घबराहट होनाI 
  •  नपुंसक व्यक्ति के अंडकोष छोटे हो सकते हैंI
  • किसी भी आपत्तिजनक वीडियो या तस्वीर को देखते हीं लिंग से वीर्य(धात) निकलना नपुंसकता का लक्षण हैI 
  • नपुंसक के रोगियों को नियमित रूप से पेट में कब्ज आदि पेट में अनेक प्रकार  की समस्याएं देखने को मिलती हैI 
  • सिर  में चक्कर और  शारीरिक रूप से कमजोरी और थकावट महसूस करनाI 
  • एकाग्रता की कमी विवाहित पुरुषों में विशेष कर  स्वप्नदोष आते हैं तो नपुंसकता के लक्षण हैंI 
  • वैसे व्यक्ति जिनको सेक्स की इच्छा होती है परन्तु उनके लिंग में किसी भी तरीके के सक्रियता या तनाव देखने को  नहीं मिलता है तो ये नपुंसकता के लक्षण हैI 
  • नपुंसकता से ग्रसित व्यक्ति की हड्डियां कमजोर होने लगती है उनके कार्य क्षमता नियमित रूप से कम होता हैI 
  • पुरुषों के छाती(CHEST) में उभार आना और बिल्कुल महिलाओं के छाती(BREAST) में तब्दील हो जानाI 
  • नपुंसकता होने वाले प्रमुख जांच –

नपुंसकता में मुख्य रूप से खून की जाँच , शुक्राणु की जाँच ,Testostrene level डाइबिटीज की जाँच,पेशाब की जांच,मानसिक स्वास्थ्य परीक्षा  आदि प्रमुख जांचे की जाती हैIनपुंसकता के उपचार प्रक्रिये नपुंसकता के लक्षण पर निर्भर करता है जिसके उपरान्त मनोचिकित्सक योग और तनावमुक्त होने में मदद करते है और शारीरिक नपुंसकता में रोगी को दवाइयां और पंप जैसे सहायक उपकरण से भी इलाज किया जाता हैI काउंसलिंग (इमोशनल कारणों को दूर करके ,तनाव-कम करके ) इरेक्टाइल डिस्फ़न्क्शन के लिए विशेष दवाएं देकर ,सर्जरी से कोई शारीरिक परेशानियों दिक्कत दूर करके किया जाता हैI

  •  नपुंसकता के घरेलु उपचार –

नपुंसकता दो तरह की होती है शारीरिक और मानसिक परन्तु अधिकांशत: लोग मानसिक से नपुंसकता से   अधिक पीड़ित होते हैं और अधिक सोचने लगते हैं जिसके बाद अपने आप को हमेशा नामर्द समझने की भूल करते हैंI

  • नपुंसकता हमारी सोच से जुडी हुई दिमागी बीमारी हैI जिसमे भय ,चिंता,उदासी से इंसान घिरा रहता है  इसलिए जरूरी है की वैसे काम करें जो पसंदीदा हो और आपको तनावरहित रखेI
  • हमेशा परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताएं और अपने आप को सकरात्मक धारणा में रखकर किसी अच्छे सेक्सोलॉजिस्ट से परामर्श लें अपने समस्याओं को लेकर गंभीर होने के बजाए अपने लाइफ पार्टनर के साथ समस्या को साझा करेंI
  • शराब ,ध्रूमपान ना करें  अधिक बाजार के खाद्य पदार्थों का सेवन न करें किसी भी तरह के पेय पदार्थ ,सॉफ्ट ड्रिंक आदि कम पियें क्यूंकि ये रसायनिकयुक्त होते हैं जिनमे से निकली रसायन पुरुष के हार्मोन्स को कम करते हैं जिसके कारण नपुंसकता उतपन्न होती हैI
  • योग और व्यायाम नियमित रूप से करेंIहमेशा भरपूर नींद लेंI
  • विशेष कर अविवाहित नवयुवक वैसी चीजें जैसे आपत्तिजनक और (Porn) अश्लील वीडियो से दूर रहें  ,इंटरनेट पर अधिक समय न बिताएंIजिससे आपको हस्तमैथुन(Masturbation)करना पड़ेIक्यूंकि अधिक हस्तमैथुन करना नामर्दी के मुख्य कारणों में से एक हैI
  • हमेशा अपने आहार में लहसून, ड्राई फ्रूट्स ,शहद और हरी सब्जियों और ताजे फल को शामिल करेंI
  •  अपने आप पर कभी संदेह ना करें ,डॉक्टर द्वारा बताई गयी दवाएं  को नियमित रूप से लेंI
  • किसी विज्ञापन के आधार पर बिना डॉक्टर के परामर्श लिए खुद से किसी भी तरह की दवाइयां का सेवन ना करेंI

नोट-  ऊपरोक्त  लिखी हुई तथ्य और बातें किसी  भी रूप से रोग के इलाज की पुष्टि नहीं करती यह  सिर्फ अपने पाठकों को जागरूक कर स्वस्थ और खुशहाल रखने के मकसद से  लिखा गया है I नपुंसकता एक ऐसी बीमारी है जिसमें व्यक्ति की दिमागी संतुलन अनियंत्रित  हो सकती है या फिर पूरी तरह से उनकी वैवाहिक और ,निजी जिन्दगी में उथल -पुथल हो सकता है 

इसलिए उपरोक्त लिखी गयी लक्षण दिखाई देने पर  तुरंत विशेषज्ञ सेक्सोलॉजिस्ट के पास जाकर सलाह  अवश्य लेंI 

 

 

  

  

हर्निया (HERNIA) के Symptom-लक्षण-cause-treatment-उपचार

 

  • हर्निया (HERNIA)

हर्निया के मामले आज पुरुषों और महिलाओं दोनों में  आजकल काफी देखने को मिल रहे हैंIहर्निया का मुख्य रूप से सबंध हमारे पेट(Stomach) और पेट के ही अंदरूनी हिस्से से हैI पर शरीर में किसी अंग पर भी हर्निया का असर दिख सकता हैI कुछ बीमारियां ऐसी होती है जो हमारे बुरे आदतों की वजह से ,दूषित खान-पान और गलत तरीके से काम करना क्षमता से अधिक भार उठाना आदि  क्रियाकलापों की वजह से हर्निया रोग उत्पन्न होता हैI हर्निया रोग को “आंतवृद्धि” रोग के नाम से भी जाना जाता हैIयह एक आम बिमारी है परन्तु अगर सही समय पर उपचार ना कराया जाए तो गंभीर बिमारी का रूप ले सकता हैI हर्निया हमारे आंतो (Intestines)की कमजोर होने के कारण होती हैI जिस अंग के इर्द- गिर्द हमारी आंते  कमजोर हो रही होती है वहां से आंत बाहर आ जाती हैI और हमारे त्वचा(skin) ढीलेपन होकर नाभि के नीचे और इसके आसपास लटकने लगता हैI हर्निया में कभी रोगी को पेट दर्द महसूस होता है दर्द का आभास नहीं भी होता हैI हर्निया में पेट के अंदरूनी अंगों जो पाचन शक्ति आदि क्रियाओं को संचित करता है वही मांस पेशियों वाले से बनी  दिल्ली कमजोर हो जाती हैI हर्निया आमतौर पर अब होता है पेरिटोनियम हमारा कमजोर होने लगता है, पेरिटोनियम हमारे पेट के अंदर होता है जो मांसपेशियों से बना होता है इसका कार्य 8 के अंगों को नियंत्रण करना है और उनके निश्चित स्थान पर बनाए रखना है तेरी टोनियर्म के कमजोरी के कारण पेट के अंदरूनी बाहर निकल आते हैं और गांठ जैसे दिखाई देते हैंI  जिसे बलपूर्वक अपने हाथों से रोगी अंदर करता है अंदर चला जाता है या कई बार लेटने सोने के दौरान यह खुद से भी गायब हो जाते हैं अगर का सही समय पर पता चल जाता है नुकसान कम कम होता है हर्निया का मुख्य रूप से इलाज सर्जरी हैI 

  • हर्निया के मुख्य लक्षण-

 हर्निया रोग में मुख्य रूप से जो भी गतिविधियां होती है अधिकांशत:  पेट से ही संबंधित है

  • पेट के किसी भी हिस्से में  गुब्बारे की तरह उभरा हुआ हिस्सा दिखाई देने लगता हैI
  •  हर्निया के रोगी को खांसने ,चलने,बोलने ,दौड़ने ,बोझ उठाते समय भी  दर्द महसूस होता हैI 
  •  कभी कभी कई हर्निया से ग्रसित रोगियों कोआराम करते समय यहां सोते समय भी दर्द महसूस होता हैI 
  •  मल -मूत्र त्यागने में परेशानी होनाI 
  • हर्निया रोग होने की प्रमुख कारण-

 

 हमारी अंतड़िया मांसपेशियों एवं कोशिकाओं से घिरी होती है,जब अंतड़ियों(Intestines) पर किसी वजह से अधिक दबाव पड़ता है तो हमारी अंतड़ियाँ कमजोर होने लगता है,और अंतड़िया फिरमांसपेशियों और कोशिकाओं पर ज्यादा दबाव डालती हैI जिस जगह ज्यादा दबाव पड़ता है उस जगह खून का संचरण सक्रीय रूप से नहीं होता हैI जिसके कारण शरीर का वह हिस्सा कमजोर पड़ जाता है I कई बार वहां  छिद्र हो जाता है उसी छिद्र के रास्ते रोगियों आंत बाहर दिखाई देने लगता ही जिसे हर्निया कहते हैI अंतड़ियों पर दबाव पड़ने और ऐसे कई कारण है जिसके वजह से लोग तेजी से हर्निया जैसे रोग से ग्रसित हो रहे हैंI

  • अगर कोई लम्बे समय से खांसी -सर्दी से ग्रसित होता है उनको हर्निया होने की प्रबल संभावना बनी रहती हैI 
  • रोजमर्रा जिंदगी में प्रतिदिन भारी बोझ उठाने के कारण या  कुछ लोग गलत तरीके से वजन उठाते हैं जिसकी वजह से हर्निया रोग हो सकती हैI 
  • पुरुषों में अक्सर देखा जाता है की खड़े होकर पेशाब करने की आदत होती है वैसे लोग भी हर्निया की चपेट में आ जाते हैं,क्यूंकि बैठ करके  पेशाब करते समय हमारे sexualअंग( organs)उनकी नसें(veins/vessel)वो सुचारु रूप से अपना कार्य करता है परन्तु खड़े होकर पेशाब करने से नसों पर खिंचाव पड़ती है जिसके कारण जहाँ से त्वचा कमजोर होने लगती है वहीँ से आंत बाहर आ जाता हैI 
  • कई लोगों का जन्मजात भी यह बीमारी रहती है  जो हर्निया से जन्मजात ग्रसित होते हैं उनकी नाभी(navel)में  उभार रहती हैI 
  • बाहरी  भोजन तला हुआ  खाद्य पदार्थ जैसे समोसा , पकौड़ी, जंक फूड चाइनीस फूड आदि भोजन करने से भी गैस और कब्ज बनता है जिसे कारण हर्निया की बीमारी हो सकता हैI 
  • हर्निया के प्रकार(Types of Hernia)

हर्निया  निकलने वाले अंगो के आधार पर कई प्रकार में बांटा गया हैI

  •  इंग्वाइनल हर्निया-यह पुरुषों के अंदर होने वाली बीमारी है  यह मुख्य रूप से 40  वर्ष से अधिक आयु के लोगों  में देखने को मिलता है ,छोटे बच्चों और बुजुर्गों में  इस हर्निया के लक्षण देखने को मिल सकते हैंI इस हर्निया में हमारा अंडकोष क्षेत्र को प्रभावित करता हैI अधिकांशत: लोग इसी हर्निया से ग्रसित होते हैंI 
  • अम्बिलाइकल हर्निया- इस प्रकार  के हर्निया जन्मजात ,महिलाओं में अधिक देखने को मिलता हैI यह मुख्य रूप से नाभि को प्रभावित करता हैI अगर नाभि वाले क्षेत्र में उभार या सूजन होता है और आंत बाहर निकल आता है  तो यह अम्बिलाइकल हर्निया के लक्षण हैI इस हर्निया के चपेट में अधिकतर वैसी महिलायें जो अधिक मोटी(Obesity)होती हैं या पूर्व में कोई सर्जरी करवाई होतीं हैं आने का संभावना अधिक रहता हैI
    • एपीगैसटिक हर्निया(हायटस हर्निया)- हायटस  पेट और छाती के बीचो-बीच मांस पेशियों की दीवार होती है जिनके बीच में आहार नली (oesophagus)होती हैI इसमें पेट का कुछ  हिस्सा बड़ा होकर छाती के कोटर में प्रवेश कर जाता हैIइसका लक्षण में एसिडिटी ,जलन और कुछ लोगों को रक्तस्राव (bleding) भी होता हैI
  • फीमोरल हर्निया(Femoral hernia)-इस प्रकार के हर्निया मुख्य रूप से जांघ के अंदर होता हैIइस हर्निया में पेट के अंग जांघ के पेअर में गुजरने वाली धमनी में मौजूद मुख से बाहर की और निकल जाते हैंIइसके लक्षण पुरुषों के मुकाबले  महिलाओं में महिलाओं में अधिक देखने को मिलता हैIइसमें नसों की आपस में उलझने का चांस अधिक रहता हैI
  •  हर्निया के इलाज के प्रक्रिया  –

 

हर्निया का मुख्य इलाज सर्जरी हैIइनके लक्षणों के आधार पर अलग -अलग हर्निया में अलग -अलग तरह की सर्जरी(opreation) किया जाता हैIसर्जरी दो तरिके से किये जाते हैं (1) Open surgery अर्थात चीरा लगाकर किया जाता है जो सस्ती होती है परन्तु इसमें इन्फेक्शन होने का भी संभावनाएं होती है ,दर्द भी होता है इस सर्जरी के बाद मरीज को आर्म की जरूरत पड़ती हैI(2) लैप्रोस्कोपिक सर्जरी-इसमें छोटे छोटे छिद्रों के माध्यम से एक जाली डालकर हर्निया का रिपेयर किया जाता है,बड़ी चीरें ना होने के कारण दर्द काफी कम   होता है और इस सर्जरी के 5 दिन बाद हीं रोगी स्वस्थ होकर अपने रोजमर्रा जिंदगी के काम करने लगता हैI अगर हर्निया शुरूआती दिनों में पहचान हो जाती है तो योग और व्यायाम के साथ कुछ दवाईयां डॉक्टर दी जाती है जिससे हर्निया ठीक भी हो जाता ही परन्तु ऐसी संभावना 20% से कम लोगों में ही देखने को मिलती हैI

  • हर्निया में इन सब चीजों का करें परहेज –

अगर आप  भी हर्निया  जैसे रोग से हमेशा सुरक्षित  कहते हैं तो निचे लिखी गयी बातों को अपने दिनचर्या में शामिल  अवश्य करें –

  • पेट को हमेशा साफ़ रखें अर्थात बाहरी  भोजन और तला हुआ व्यंजन न करेंI
  • पुरुष और किशोर भारी वजन उठाना ,दौड़-धुप करना ,उछल -कूद करना आदि शारीरिक क्रियात्मक क्रियाएं बिना लंगोट पहने ना करें I
  • अंडे ,मांस-मछली  का सेवन शराब ,ध्रूमपान आदि ना करेंI 
  • अगर खांसी ,सर्दी ,कब्जीयत   डॉक्टर से संपर्क करेंI
  • मोटापा को कम करें I
  • भूख से अधिक भोजन ना करें पेय पदार्थ ,सॉफ्ट ड्रिंक ,चाय ,कॉफ़ी आदि का सेवन कम से  कम मात्रा में करें या ना करें तो सर्वोत्तम हैI
  • दालचीनी का पाउडर प्रतिदिन खाएं ,सेब ,संतरा अदि जैसे फल -हरी सब्जियों को अपंने आहार में अवश्य शामिल करेंI
  • बिना गर्म किये पानी ना पियें अर्थात गुनगुना पानी पीया करेंI
  • केमिकल से उतपन्न अन्न और सब्जियां ग्रहण ना करें हमेशा ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थ को अपने आहार में शामिल करेंI
  • हर्निया रोग में की जाने प्रमुख जांचें –

 हर्निया का कोई विशेष जांच नहीं होती है पर कुछ अवस्था में डॉक्टर अल्ट्रासॉउन्ड,MRI ,सीटी स्कैन आदि करवाते हैंI

नोट-उपरोक्त लिखी गयी आलेख अपने पाठकों को जागरूकता बढ़ने तथा नये -नये रोगों के बारें में विस्तृतपूर्वक बताकर रोगों से अवगत करवाना हैI हम किसी प्रकार के इलाज की पुष्टि नहीं करते हैं अगर आलेख में लिखी गयी लक्षणों में से कोई भी लक्षण महसूस हो तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करेंI इस आलेख के आधार पर स्वयं  प्रारम्भ न करेंI 

 

 

  

हकलाने की बीमारी (Stammering/Stutterin) आदत कैसे ठीक करें

 

  • हकलाना (Stammering/Stutterin)

जब  कोई छोटा बच्चा  अपने शुरूआती दिनों में बोलना शुरू करता है तो, किसी शब्द का सही उच्चारण नहीं कर पाता वह तोतलाकर और हकलाकर बोलता  हैI उस समय उनका बोली (वाक्य)काफी मनोरंजक और शोभनीय लगता है,परन्तु एक निश्चित उम्र के बाद लगातार वही आदत रह जाती है बोलना कुछ चाहता है और उसके मुंह से दूसरे शब्द निकलता है अर्थात तोतलाता हैI अगर किसी शब्द को  बोलने में काफी समय लेता है और व्यक्ति कुछ देर बाद बोलता है या कोई शब्द के बिच में या अंत में अटक जाता है या किसी विशेष शब्द को बोलने में समस्या आती है और उनका चेहरे का भाव (Expression)बदल जाता है व्यक्ति का मुंह देर तक खुली रहती है तो उसे ही हकलान कहते हैं अर्थात वह व्यक्ति बोलने में हकलाता हैIअगर ५ वर्ष से अधिक आयु के  किसी भी लड़के -लड़कियों अगर स्कूल जाने लगते हैं उसके बाद हकलाते हैं यह गंभीर हो स्का है और एक रोग का आकर ले लेगाI इसी तरह से अगर उनकी यह समस्या Advance Stage में जाने पर अर्थात किशोरावस्था में जाने पर भी जब वह कॉलेज के विद्यार्थी हो जाता है ,या किसी व्यवसाय(Profession) या नौकरी करने लगे तो उस समय हकलाने लगे तो व्यक्ति को काफी समस्याएं आने लगती है खुद में ही   काफी दबाव मह्सूस करने लगता है,अपनी किसी विचार को स्पष्टता से जाहिर करने से डरता है ,उनमें काफी आत्मविश्वास की कमी देखने को मिलती है और व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार हो जाता हैI उनकी नियमित रूप से इलाज कर ऐसी समस्याओं के किसी भी महिला या पुरुष के जन्मजात विकृतियों का सामाधान संभव हैI 

  • हकलाना क्या है?

हकलाना(stammering) एक प्रकार की बोलने की बाध्यता है,जिसमें वक्ता बोलने वाले शब्द को ना चाह कर भी   के धवनियों को दोहराता हैI यह एक आम समस्या है जिसे रोगी के श्रेणी में नहीं रखा जा सकता हैI यह बचपन में शुरू होता है, जिसमें बच्चों की बोलने की क्षमता विक्सित हो रही होती है तो वह हकलाकर बोलता है जो सामन्य है उन बच्चों की उम्र 2 से 7 वर्ष होती है परन्तु इसके बाद अर्थात 10 वर्ष के अधिक की आयु वाले बच्चों में भी यह हकलाहट बनी रहती है तो काफी चिंता का विषय बन जाता हैIयह कत्तई आवश्यक नहीं है की हकलहाट किसी दबाव या सार्वजनिक रूप से हिचकिचाहट के कारण होता हैI यह आनुवंशिकी भी हो सकता हैI लड़कियों के तुलना में लड़कों में हकलाहट अधिक देखने को मिलता हैI

  • हकलाने का मुख्य  कारण क्या है?

हकलाते  क्यों है इसका कोई ठोस सबूत अभी तक आधुनिक चिकित्सा में भी नहीं मिल पाया हैI परन्तु कुछ मुख्य  निम्न कारणों की वजह से बच्चे हकलाते हैंI

  • यह अनुवांशिक भी हो सकता है अर्थात उनके  माता-पिता को इस प्रकार समस्याएं रही हो तो  उनके बच्चों में भी इस प्रकार की अवरोध देखने को मिल सकती हैI 
  • जीभ और होठों में जरुरत से अधिक नियंत्रण अर्थात जीभ और होठ उतनी तेजी से काम नहीं करनाI 
  • वैसे बच्चें जिनको अपने घर में अपेक्षाकृत प्यार -दुलार नहीं मिलता तो उनमें हकलाने की समस्याएं उतपन्न हो जाती हैI 
  • बच्चे की भाषा पर पूरी ज्ञान न होना जिस कारण वह बोलने से हिचकिचाता(खुद पर संशय)करता है और उसी आदत की वजह से हकलाने लगता हैI 
  • बहुत भावुक होनाI 
  • मानसिक तनाव या एकाग्र नहीं हो पानाI 
  • कभी -कभी छोटे बच्चे अन्य साथी जो पहले से ही हकलाने की समस्या से ग्रस्त है तो उनकी नकल करते हैं जो आदत बन जाती है जिसके कारण भी हकलाहट पैदा हो सकता हैI 

  •  हकलाने की समस्या को दूर कैसे करें?(घरेलु उपचार)

हकलाने के परेशानी का लोग उपचार हेतु अधिकतर लोग होम्योपैथिक विधि से करवाने की सलाह देते हैंI हकलाने वाले लोगों को दवा से अधिक मोनोचिकित्स्क और स्पीच थेरेपिस्ट की मदद ली जाती हैI ऐसे लोग हकलाते हैं  विश्वास थोड़ा कम होता है ,सार्वजनिक जगह पर उसका मजाक उड़ाने की वजह से उसकी आत्मविश्वास में लगतार गिरावट देखि जाती है जिसकी वजह से वह सार्वजनिक स्थलों पर या सार्वजानिक सामरोह में जाने से कतराते हैंI इसलिए उनके परिवार के  सदस्यों को चाहिए की हमेशा उन्हें प्रोत्साहित कर आत्म -विश्वास पैदा करने की कोशिश करें I कुछ बच्चों में देखि जाती है कई बार जीभ उनकी अधिक चिपकी होती है तो हल्की सर्जरी करवाना पड़ता हैI किसी शब्द को वो गलत तरिके से उच्चारण कर रहा  तो उसे बार -बार ना टोकें(सुझाव दें) उस पर किसी भी तरीके का गुस्सा न करें बल्कि धैर्यपूर्वक और प्यार से उसे समझाएंI स्पीच थेरेपिस्ट द्वारा उन्हें क्रमशः उसी शब्दों को बुलवाया जाता है और गाना गनवाने की कोशिश करवाते हैंI अक्सर देखा जाता है की हकलाने वाला व्यक्ति को गाना गाते समय कोई विशेष परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है इसके सन्दर्भ में मनोचिकित्सक  कहते हैं की गाते समय शब्दों के इस्तेमाल और उसे बोलने के समय को लेकर दिमाग में कोई अनिश्चितता या किसी तरह का तनाव नहीं होता जिसकी वजह से उन्हें गाते समय उतनी अवरोध पैदा नहीं होतीI यदि बड़ी उम्र में बोलने की सबंधित या हकलाने की सबंधित समस्याएं हो तो न्यूरोलॉजिस्ट ,ENT डॉक्टर ,मनोचिकित्सक के पास उपचार के साथ -साथ योग और व्यायाम करने की निरंतर सलह दी जाती हैI 

नोट-नोट-उपरोक्त लिखी गयी आलेख अपने पाठकों को जागरूकता बढ़ने तथा नये -नये रोगों के बारें में विस्तृतपूर्वक बताकर रोगों से अवगत करवाना हैI हम किसी प्रकार के इलाज की पुष्टि नहीं करते हैं अगर आलेख में लिखी गयी लक्षणों में से कोई भी लक्षण महसूस हो तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करेंI इस आलेख के आधार पर स्वयं  प्रारम्भ न करेंI 

 

  

KIDNEY(गुर्दा)किडनी के बीमारियों के Symptom-लक्षण-cause-treatment-उपचार

 

  • किडनी के बीमारियों के लक्षण ,कारण एवं निवारण 

गुर्दे से सबंधित कोई भी रोग हो अगर सही समय पर रोग की पहचान न हो पाए तो काफी घातक साबित हो सकता है | दरअसल KIDNEY(गुर्दा) पूर्ण शरीर को स्वस्थ्य रखता है KIDNEY हमारे अंदर की दूषित खाद्य पदार्थ को निकालना ,खून का शुद्धिकरण ,शरीर में जल एवं रसायनो का संतुलित करना आदि प्रमुख कार्य किडनी द्वारा ही संपन्न होती हैI आज के भागदौड़ भरी जिंदगी में शुद्ध खान-पान और शुद्ध वातावरण के लुफ्त उठाने से लोग धीरे -धीरे वंचित हो रहे हैंI इसलिए गुर्दे से संबंधित रोगों में काफी तेजी से इजाफा हो रहा है और गुर्दा नियमित रूप से काम नहीं करता है तो शरीर में आंतरिक और बाहरी रूप से लक्ष्य दिखाई देता हैI  अगर हम सही समय पर उस लक्षणों  को पहचान ले तो अपने गुर्दे को क्षय होने अर्थात खराब होने से बचाया  जा सकता हैI हमारे शरीर में दो गुर्दे अर्थात किडनी होता है जो बाएं और दाएं तरफ होता हैI किडनी एक ऐसा अंग है जो हमारे शरीर के प्रतिकूल जो हमारे शरीर की गंदगी (waste materials )जो हमारे लिए हानिकारक हो जाती है उसे पेशाब और मल के रास्ते से साफ़ कर बाहर निकालती हैI हमारा शरीर एक ऐसी संरचना है जिसका  कार्य करना कभी रुकता नहीं बल्कि निरंतर सक्रिय रहता है चाहे वह सोते समय भी क्यों ना हो शरीर का अंग हर समय कार्यरत रहता हैI  इन सब कार्यों में हमारे kidney(गुर्दा) महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैI

   आज के भागदौड़ और तनावपूर्ण जिंदगी में सबसे पहले और किसी अंग पर असर पड़ता है तो सर्वाधिक रूप से गुर्दे पर है चाहे वह कब्जियत की बीमारी हो या शरीर के अंग में कोई विकारI  हमारे गुर्दों की एक निश्चित निर्धारित अपनी स्पीड होती है अगर वह उससे धीमी चलने लगे तो हमें अनेक प्रकार के रोग होता है सही खानपान आम जीवन में न मिल पाना हमारे सेहत पर उसका असर पूर्ण होता है इसके अलावा रोजाना समय पर न जागना योग एवं व्यायाम  ना करना हमेशा तनाव और मोटापा लाता है जिससे कोई भी बाहरी या आंतरिक रूप से रोग उत्पन्न होने लगता है इसलिए यह बहुत जरूरी हो जाता है जितना घर पर ही तैयार किए गए अंकुरित भोजन आनंद लेI प्राकृतिक रूप से तैयार किये गए खाद्य पदार्थों को अधिक वरीयता दें I  उतना ही पर्याप्त मात्रा में नींद लें योग और व्यायाम करेंI

  • kidney(गुर्दे)का बिमारी का पहचान कैसे करें ?

गुर्दे से संबंधित रोग में इजाफा होने के कारण नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल(एनजीटी) केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को देशभर में गंभीर रूप से प्रदूषित और बेहद प्रदूषित इलाकों में 3 महीने के भीतर प्रदूषण फैलाने वाले औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का निर्देश दिया है क्योंकि  लगातार स्वास्थ्य गिरावट लोगों में देखी जा रही हैI प्रदूषण और दूषित वातावरण की वजह से हमेशा बीमारियां उतपन्न होती है जो कि सबसे अधिक हमारे फेफड़े, यकृत और गुर्दे(KIDNEY) प्रभावीत करती हैI 

   (kidney) किडनी पेट के अंदर पिछले हिस्से में रीढ़ के हड्डी के दोनों तरफ के पीठ के भाग में स्थित रहता है जो बाहर से स्पर्श करने पर महसूस नहीं होता हैI हम जो भी खान पान खाते हैं या पीते हैं जो उपयोगी खाद्य पदार्थ है जो हमारे शरीर के लिए लाभदायक है उसे शरीर में रखकर बाकी पदार्थ जो दूषित और हानिकारक हो जाता है हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाता है उसे किडनी पेशाब और मल त्याग के द्वारा शरीर से बाहर उत्सर्जित कर देता हैI  हमारा हिमोग्लोबिन के निर्माण में भूमिका रहती है इसके बिना RBC का निर्माण – प्रक्रिया असंभव हैI RBC (RED BLOOD CELLS)हमारे ऑक्सीजन को सक्रिय रूप से संचरण होने के क्रिया को नियमित रूप से करने में सहायक होती है I अगर दूसरे शब्दों में कहें तो ऑक्सीजन का हमारे शरीर में सप्लाई RBC की माध्यम से होता हैI अगर पेशाब की मात्रा कम हो जाए या उनके रंगों में बदलाव हो तो यह संभव है कि गुर्दे(Kidney) की बीमारी दस्तक दे रही है, इसके अलावा पेशाब में झाग, जलन आदि कई प्रकार के  अन्य विकार उत्पन्न होने लगती है तो हमें समझ लेना चाहिए कि गुर्दे से संबंधित बीमारी का आगमन है और शुरुआती लक्षण में डॉक्टर से संपर्क करनी चाहिएI अगर पेशाब की मात्रा की कम हो जाती है तो शरीर में यूरिया बढ़ने की आशंका अधिक रहती है जो धीरे-धीरे शरीर में घाव ,सूजन आदि में भी सहायक होते हैं जो शरीर को हानिकारक कर सकते हैंIअगर पैरों और शरीर के अन्य भागों खासकर आंखों के नीचे,घुटनों ,कोहनी अन्य अंगों में सूजन हो तो यह भी किडनी के खराब(Failure) होने के संकेत होते हैंI kidney(गुर्दे) अगर नियमित रूप से समस्या और अन्य बीमारियां का सामना  कर रही हो तो कहीं ना कहीं हमारे ब्लड प्रेशर पर भी प्रभाव पड़ता है और B. P हमेशा बढ़ने लगता है अर्थात व्यक्ति हाइपरटेंशन (high blood pressure) का रोगी हो जाता हैI

  •  किडनी रोग में दिखने वाली प्रमुख लक्षण (Symptomps of Kidney Disease) – किडनी  जब बीमारी होती है तो   रोगी अनेक प्रकार के समस्या उत्पन्न होने लगती हैI जैसे कि उर्जाहीन महसूस करना, कमजोरी महसूस करना, सांस लेने में परेशानी चलते चलते सीने में दर्द और सिर में अधिक तनाव और दर्द हो तो यह भी किडनी खराब होने के प्रबल संकेत हैंI एनीमिया और भूलने की बीमारी इसके अलावा भूख भी धीरे धीरे कम होने लगती है और  भोजन का स्वाद स्वादहीन लगने लगता हैI इसके अलावा त्वचा में अलग-अलग प्रकार के चर्म रोग संबंधी बीमारियां खुजली, एग्जिमा के साथ-साथ जी मचलना और दस्त और उल्टी आना किडनी के खराब होने के कारण ही अधिक होता हैI अगर हम नियमित दिनचर्या और संतुलित भोजन को अपनाएं इस बीमारी से हमेशा बचे रह सकते हैंI अगर हम लक्षणों से पहले से ही वाकिफ हों  तो किडनी के जो खुद खतरे का संकेत देती है हम जान सकते हैं किडनी की बीमारी काफी खतरनाक है क्योंकि यह प्रथम अवस्था में इसकी अवस्था या खराब होने का पूरी संकेत स्पष्टीकरण रूप से नहीं हो पाता इसलिए हमें हमेशा सावधानी बरतनी होगीI इसके उपरोक्त लिखी गयी लक्षणों के अलावा हमेशा दर्द महसूस होना या पेशाब करने पर भी पेशाब का अनुभूति होना आदि लक्षणों के साथ -साथ ठंड लगने तेज बुखार आती है जो किडनी के विकार का संकेत हो सकते हैंI 
  • गुर्दे ख़राब होने का मुख्य कारण (CAUSE OF KIDNEY FAILURE) 

किडनी खराब होने का मुख्य वजह पहले से ग्रसित  बीमारियां से भी है जैसे कि मूत्र मार्ग में संक्रमण होना।,गर्भावस्था के दौरान प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण भी विशेषकर महिलाओं में किडनी रोग होने की आशंका अधिक रहती हैI शरीर के अंग में KIDNEY का बहुत ही अहम  भूमिका होता है क्योंकि शरीर की संरचना पूर्ण रूप से सक्रियता गुर्दा (KIDNEY)के कारण होता हैIकिडनी खराब होने का मुख्य कारण हमारी खुद की लापरवाही जैसे कि बाजारु और दूषित खान-पान जो शरीर में इतना ज्यादा पोषक तत्त्व  पर्याप्त मात्रा में ना मिलना , सुबह समय पर नित्यकर्म ना करना ,नमक और शराब का अधिक सेवन ,धूम्रपान करना और दूषित भोजन करना,पेशाब को रोकना ,पानी काम पीना ,नींद ना लेना ,अधिक सोच आदि प्रमुख लापरवाहीयां खुद के किडनी के  दुश्मन बनाता हैI गुर्दे की बीमारियां मुख्य रूप से स्थिति के आधार पर दो भागों  में बांटा गया है -(1) CRF (CHRONIC RENAL FAILURE ) (2)CRD(CHRONIC RENEAL DISEASE)

जैसा कि मालूम है कि हमारे गुर्दे का का मुख्यतः काम है कोई भी खान-पान अच्छी चीजों को पाचन क्रिया में सहायक होता है और ऊर्जा वाहन बनाने का नाम कार्य करता है और जितने भी दूषित पदार्थ है उसे विभिन्न तरीकों  से शरीर के बाहर निकालने का कार्य करता हैI गुर्दे(KIDNEY)लगातार पेशाब (URINE) बनाने का कार्य करते हैं और पेशाब के माध्यम से ही दूषित पेय पदार्थ को बाहर निकालने का कार्य करती हैI कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं जो हमारे शरीर में लंबे समय से चलती है तो हमारे किडनी पर उसके विपरीत प्रभाव पड़ता है वह KIDNEY  की कार्य क्षमता को कम कर देती है और नियंत्रण न रखने पर गुर्दे का काम करना बंद कर देती हैI जैसे -डायबिटीज -डायबिटीज एक ऐसी बिमारी  है ,जो शरीर में कई प्रकार की विकार  पैदा करती हैI यह अनुवांशिकी भी फैलता है और अपने दिनचर्या  में गलत आहार लेने से भी , अधिक शक्कर के सेवन से भी इसलिए जरूरी है कि शुरुआती लक्षणों में डायबिटीज को नियमित रूप से इलाज करवाएं और हमेशा डॉक्टर से सलाह लेI

      हाइपरटेंशन(उच्चरक्तचाप)-हाई ब्लड प्रेशर एक ऐसी बीमारियां है जिसको शुरुआती तौर पर ही उपचार करना बेहद जरूरी है क्योंकि यह किडनी के फेल होने का मुख्य कारण है अगर हम अपने बीपी पर नियंत्रण न रख पाए तो यह धीरे-धीरे गुर्दे को निष्क्रिय कर देता हैI  इसके अलावा अनेक प्रकार के गुर्दे से संबंधित भी कई प्रकार के रोग हैं जिसके कारण किडनी गंभीर बीमारियां या किडनी फेल होने की आशंका रहती है जैसे-KIDNEY STONE (गुर्दे में पथरी),किडनी में सूजन आना ,नेफ्रोटिक सिंड्रोम (मूत्रमार्ग में जन्मजात तकलीफ) आदिI कुछ लोगों को पेशाब में संबंधित रोग समस्या देखने को मिलती है जैसे उनकी पेशाब में जलन या पेशाब कम आना अर्थात पेशाब पर्याप्त मात्रा में ना होना यह हमेशा पेशाब का वास लगना यह कुछ लोग ऐसे होते हैं जो  विशेषकर आम कामकाजी लोगों जो दफ्तर में यात्रा करते हैं उन्हें प्राय: देखा जाता है कि वह लंबे समय तक अपने पेशाब को रोक करते हैं जिससे भी किडनी खराब होने का बहुत सारी आशंका होती हैI बिना डॉक्टर की सलाह पर कोई एंटीबायोटिक या पेन किलर दर्द की दवाई लंबे समय तक सेवन करने से गुर्दे पर प्रेशर पड़ता है और धीरे-धीरे किडनी फिर कर देता है अर्थात खराब कर देता हैI वैसे लोग जो पानी कम पीते हैं उन्हें भी किडनी फेल होने की आशंका अधिक रहती है इसलिए बेहद जरूरी है कि अधिक से अधिक मात्रा में स्वच्छ जल हमेशा पीनी चाहिएI  अगर आप चाय या कॉफी अधिक मात्रा में पीते हैं तो वह डिहाइड्रेशन और हाइपरटेंशन में तब्दील हो जाता है जिससे हमारे किडनी पर असर पड़ता है और वह आपकी गुर्दे (Kidney)को क्षतिग्रस्त कर सकता हैI इसके अलावा रासायनिक युक्त पेय पदार्थ जैसे कि कोल्ड ड्रिंक, सॉफ्ट ड्रिंक , जंक फूड सेवन करने से किडनी खराब होने की आशंका रहती हैI 

  •  गुर्दे की डायलिसिस क्या है?(What is kidney Dialysis)?

जब किडनी की बीमारी गंभीर अवस्था अर्थात स्टेज -5 में चला जाता है तो डायलिसिस की जरूरत पड़ती हैI  गुर्दे की डायलिसिस यह एक एक प्रकार के इलाज की विधि है जिसमें से गुर्दे की खराब हो गया भाग को दूर करने के लिए एक मशीन (उपकरण) द्वारा   गुर्दे की सुधार हेतु इलाज की जाती हैI किसी भी कारणवश हमारे किडनी अगर फेल हो जाती है अर्थात उनकी कार्यक्षमता 85 प्रतिशत काम करना बंद कर दे तो , किडनी  निष्क्रिय हो जाता है जिसके फलस्वरूप हमारे शरीर के अंदर जमे हुए कुछ दूषित खाद्य पदार्थ को निकालने के लिए डायलिसिस करवाने की जरूरत पड़ती हैIडायलिसिस प्रक्रिया के दौरान कुछ हानिकारक तत्व जो खाद्य पदार्थों से हमारे शरीर के अंदर सम्मिलित होता है डायलिसिस स्थायी  और अस्थायी दोनों होते हैं I यदि रोगी के गुर्दे में इस स्थिति में ना हो कि उसे पूर्ण रूप से प्रत्यारोपित किया जाए तो उस समय डायलिसिस की अस्थाई प्रक्रिया अपनाई जाती हैI 

  • डायलिसिस के प्रकार (Types of Dialysis)-

डायलिसिस मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-(1)Hemodialysis (हेमोडायलिसिस) अर्थात H.D (2) Peritoneal dialysis (पेरिटोनियल डायलिसिस) अर्थात P.D 

        HEMODIALYIS –Hemo का  चिकित्सीय भाषा में अर्थ होता है खून(Blood)अर्थात खून से डायलिसिस होना एक ऐसी प्रक्रिया है जो अस्पताल में किया जाता हैI  इसमें रोगी के खून को डायलाइजर द्वारा किया जाता है रक्त का शुद्धिकरण किया जाता हैI डायबिटीज, हाइपरटेंशन जैसे रोगों से ग्रसित रोगियों में हेमोडायलिसिस  द्वारा उपचार किए जाते हैंI यह सप्ताह में तीन बार करवाया जाता हैI हीमोडायलिसिस में रोगी के शरीर के एक भाग से खून लिया जाता है और वह खून एक मशीन के अंदर जाता है I वह मशीन बिल्कुल हमारे गुर्दे का जो कार्य होता है वही कार्य  वह मशीन करती है और मशीने बहुत तेजी से कार्य करती है I किडनी दूषित खाद्य पदार्थ को 2 दिन में फ़िल्टर कर बाहर निकलती है उसे मशीन 4 घंटे में ही फ़िल्टर करती हैI

    Peritoneal dialysis- इसका मुख्य संबंध पेट (liver) से हैंI  इसको घर पर भी उपचार किया जा सकता हैI इसमें ग्लूकोस आधारित 8 समाधान में तकरीब  2 घंटे तक डायलिसिस प्रक्रिया अपनाई जाती हैI इस प्रक्रिया में डॉक्टर रोगी के एब्डोमेन के अंदर एक टाइटेनियम लगा देते हैंI अजीसी ब्लॉक के द्वारा एक  एक तरल रसायन पेट में प्रवेश कराया जाता हैI पेट के अंदर की सिल्ली डायलाइजर का काम करती है और जो रसायन पेट के अंदर प्रवेश कराया जाता है उसे पी.डी.फ्लूइड ए नाम से जाना जाता है जो कि अच्छे पदार्थों को शरीर में प्रवेश कराकर दूषित और हानिकारक पदार्थों को रक्त से बाहर निकालने का कार्य करता हैI  इसकी प्रक्रिया में 6 घंटे का समय औसतन लगता हैI 

डॉक्टर द्वारा सर्वाधिक हिमोडायलिसिस सलाह दिया जाता है जो काफी प्रभावकारी होता हैI 

  • डायलिसिस रोग में क्या खाएं और क्या ना खाएं( Diet plan for dialysis)-

जब किडनी रोग से लोग ग्रसित होते हैं तब उनके खान-पान डॉक्टर द्वारा अलग बताया जाता है जबकि डायलिसिस रोगियों के खान-पान बिल्कुल ही अलग होता है इसलिए आप सभी  भ्रमित ना हो की हर किडनी रोगियों को एक प्रकार का ही परहेज सावधानियां ,भोजन करना पड़ेगा

  •  डायलिसिस  रोगियों को प्रोटीन की बेहद जरूरी होती है इसलिए शाकाहारी लोगों को लिए सोयाबीन ,पनीर दाल आदि प्रोटीन युक्त भोजन करने की सलाह दी जाती है जबकि मांसाहारी लोगों के लिए अंडे , मछली का मांस खाने की सलाह दी जाती हैI 
  • पोटेशियम युक्त भोजन खाने की सलाह बिल्कुल नहीं दी जाती अर्थात हरी सब्जियां जिसमें पोटैशियम अधिक होती है और खट्टे फल जैसे कि संतरा ,नींबू ,मौसमी आदि आदि का सेवन नहीं करना चाहिएI 
  •  नमक  बिल्कुल कम मात्रा में लेना होता हैI 
  • डायलिसिस के रोगियों को पेशाब प्रचुरता के आधार पर  पानी, जूस और अन्य तरल पदार्थ की मात्रा निर्धारित की जाती हैI 
  •  डॉक्टर द्वारा दी गई उद्देश्य और सावधानियों को इमानदारी पूर्वक पालन करें इसके अलावा दी गई दवाइयों को नियमित रूप से लेंI 
  •   किडनी रोग से बचने का  घरेलू उपाय

किडनी हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है अगर किडनी स्वस्थ रहे तो मनुष्य हमेशा स्वस्थ रहेगाI  हमारे शरीर में पानी और उनको शुद्ध करके मल्ल और पेशाब के जरिए टॉक्सीन बाहर निकालने के साथ- साथ RBC निर्माण भी करता हैI  इसलिए यह जरूरी है कि जो अंग हमारे जन्म से ही हमें जीवन प्रणाली देकर सुरक्षा प्रदान करता हैI उसके लिए अपने नियमित खानपान और कुछ अच्छी आदतें अपने दिनचर्या में शामिल कर ले तो हमेशा किडनी से संबंधित बीमारियों से छुटकारा आ सकते हैं अर्थात उन्हें गुर्दे  से संबंधित कोई भी बीमारी होने की आशंका नहीं रहेगीI 

  • हमेशा आहार में विटामिन ,पोषकतत्व युक्त ,खनिज(MINERALS)  भरपूर भोजन शामिल करेंI
  • पानी अधिक मात्रा में हमेशा पियें क्यूंकि अधिक पानी पिने से ही मूत्र के जरिये दूषित पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता हैI
  • हरी और  पत्तेदार  साग सब्जियां भरपूर मात्रा में अपने आहार में शामिल करें क्योंकि उनमें ल्यूटेन  नामक विशेष पोषक तत्व होते हैंI 
  •  अंडे और अजी मछलियां प्रोटीन युक्त होती हैं इसलिए हमेशा सप्ताह में 3 दिन जरूर खाएंI 
  •  तरबूज ,खीरा , गाजर ,मूली  ,सेब ,अनार ,चुकंदर जैसे फल  खाएं और जूस भी ले सकते हैंI 
  • शराब, बीड़ी ,सिगरेट, चाय और कॉफी अधिक सेवन गुर्दे का हानि पहुंचाता हैI  इसलिए धूम्रपान और शराब बिल्कुल न पियेंI 
  •  पेशाब को नियमित तौर पर  कभी भी रोक कर रखने की कोशिश न करें इससे हमारे  गुर्दे पर दबाव बढ़ता है जो किडनी को नुकसान पहुंचाती हैI 
  •  हमेशा हमारी किडनी  24 घंटे काम करती है तो  उनके ऊतक(tissue) क्षय होते हैं और फिर बनते हैं  इसलिए हम सोते हैं तो हमारी किडनी के tissues का नव निर्माण होता है इसलिए भरपूर मात्रा में नींद लेना बेहद जरूरी हैI 
  •  अधिक नमक, मसाले वाले भोजन, जंक फूड , सॉफ्ट ड्रिंक और मिठाईयां के  सेवन करने से भी यूरिन प्रोटीन तेजी से निकल जाते हैं और केवल दूषित खाद्य  पदार्थ का शरीर में निर्माण करते हैं जो कि किडनी के लिए नुकसानदायक है कर सकता हैI 
  •  हमेशा समय पर सोने और जागने साथ साथ रोजाना योग ,डांस , व्यायाम जरूर करेंI 
  •  डॉक्टर द्वारा बताई गई सलाह को  पालन करें और नियमित रूप से जांच जरूर करवाएंI 

 

निमोनिया PNEUMONIA in Kids Symptom-लक्षण-cause-treatment-उपचार

 

  • निमोनिया(PNEUMONIA)

निमोनिया एक  संक्रामक बिमारी है जो अधिकांशत: बच्चों में होती हैIजो अधिकांशत: कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले व्यक्तियों में अधिक होती हैI जिसका सीधा असर फेफड़ों पर पड़ता हैI इसके अलावा पुरे शरीर पर भी इसका असर देखने को मिलता हैI केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर में निमोनिया तेजी   से पांव पसार रही हैI निमोनिया एक जानलेवा बिमारी हो जाता है यदि तुंरत उसके लक्षण को जानकर उपचार न किया जाएI विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार बच्चों की अधिकतम मौत निमोनिया के कारण होता हैI अधिकतम नवजात शिशुओं को जिनकी उम्र 5 साल से कम होता है दुनिया के 18% बच्चों  की मौत निमोनिया के कारण होती हैI भारत में निमोनिया फैलने का मुख्य वजह इस बीमारी के प्रति लोगों की जागरूकता की कमी हैI अभी हाल ही में माता -पिता और अभिभावकों के बिच एक सर्वे कराया गया जिसमें से बहुत ही कम लोगों को इस बीमारी के लक्षण ,कारण और निदान के बारे में पता थाI देश में अभी भी निमोनिया के मरीजों की संख्या लागतार बढ़ती जा रही हैI लोगों को इस बीमारी के प्रति जागरूक करने और वैश्विक स्तर पर इसे ख़त्म करने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 12 नवंबर को ‘विश्व निमोनिया दिवस’ मनाया जाता हैI निमोनिया को प्रारंभ में रोकना बेहद जरूरी है वरना यह जानलेवा साबित हो सकती हैI उसमे शुद्ध हवा का आवागमन न होने से मरीज ठीक से सांस भी नहीं ले पता हैI इसके लिए यहाँ  निमोनिया के बारे में विस्तृतात्मक निमोनिया के बारे में न सिर्फ बताया जा रहा है बल्कि कुछ आसान तरीके दिए जा रहे हैं जिनसे आप घर पर हीं निमोनिया के शुरूआती दौर में पकड़ सकते हैंI

  • निमोनिया क्या है?(what is pneumonia)

निमोनिया सीधे हमारे फेफड़े और छाती को प्रभावित करता हैIयह  स्ट्रेपोकोकस नामक बैक्टीरिया के कारण सबसे अधिक फैलता हैI निमोनिया  फेफड़ों में होने वाले संक्रमण है बच्चों के ही नहीं बल्कि बुजुर्गों को भी अपनी चपेट में ले लेता हैI बच्चों में सर्दी जुकाम  खांसी तीन-चार दिनों से अधिक रहने पर धीरे धीरे निमोनिया में बदल जाता हैI जीवाणु और विषाणु दोनों रूप से फैलता है इसके अलावा अन्य  बीमारियों यह कारण भी हो सकता हैI निमोनिया शुरुआत में फेफड़ों के एक थैलियों में अपना विकृति दिखाना शुरू करता है और तुरंत ही दोनों को अपने चपेट में ले लेता हैI फेफड़ों के दोनों थैलियों  में रोगी को जलन महसूस होता हैI इसके साथ ही वायु की थैलियों में और पानी भर जाता है एक प्रकार से निमोनिया को फेफड़ों के संक्रमण भी कहते हैंI निमोनिया छाती के इनफेक्शन होने से भी होता हैI निमोनिया के रोगी को सांस लेने में काफी दिक्कत होता है ,निमोनिया में वायरस से ज्यादा बैक्टीरिया से संक्रमण होता हैI निमोनिया से प्रभावित रोगियों को खांसी, सर्दी, बुखार के साथ-साथ खाने की भी इच्छा नहीं होती हैI  यह फंगस कारण भी हो सकता हैI निमोनिया इनफ्लुएंजा रेस्पिरेटरी सिंसिटियल वायरस के कारण भी होता हैI निमोनिया साधारण से लेकर जानलेवा तक हो सकता हैI यह अधिकार था अधिकांशत:सर्दियों एवं ठंड के मौसम में होता हैI अधिक समय तक जाड़े के दिनों में बाहर यात्रा करने ,ठंडा पानी पीने और अधिक वैसे भोज्य खाद्य पदार्थ जो ठंडी हो उसके सेवन से भी यह रोग उत्पन्न होता हैIनिमोनिया मुख्यत: दो टर्म में होता है वायरल और बैक्टीरियलI वायरल निमोनिया में आसपास के प्रदूषित वातावरण के कारण  फैलता है, यह संक्रामक रूप में अन्य लोगों से भी फैलता हैI बैक्टेरियल निमोनिया केवल एक ही व्यक्ति को प्रभावित करती है,यह रोगी को खांसी,जुकाम से शुरू होते है अल्प समय में ही बुखार में तब्दील हो जाता हैI बैक्टेरियल निमोनिया से पीड़ित रोगियों के कफके साथ -साथ खून आने लगता है और बुखार ,उल्टियां निरंतर अधिक होता हैI 

  • निमोनिया के लक्षण –
  • निमोनिया में मुख्यत:  रोगी को बुखार ,खांसी और तेजी से सांस लेते हैंI 
  • भूख कम लगना ,दस्त और उल्टियां होती हैI 
  • निमोनिया से पीड़ित रोगी में अक्सर देखा जाता है खांसी गले  के बजाय सीने के गहराई से आती अर्थात उनके खांसने का तरीका अलग होता हैI 
  • साँस लेते समय बच्चे की पसलियां अंदर खींचती हैI 
  • जकड़न और छाती में दर्द के अलावा सांस लेने में काफी तकलीफ होता हैI 
  • फेफड़े में हमेशा कफ रहनाI 
  • शरीर में ख़ास कर सिर में लगातार या कभी -कभी दर्द होनाI 
  •  खास कर बच्चों को जब निमोनिया होती है तो उन्हें दूध पीने और खाने की भी इच्छा नहीं होतीI 
  • रोगी हमेशा सुस्त हो  और उनका रक्तचाप भी कम हो जाता हैI 
  • त्वचा ,नाखून ,होठ या  सम्पूर्ण चेहरे हल्के नील रंग के हो जाते हैंI 
  • बच्चे को अगर उनके उम्रानुसार नियत स्पीड से ऊपर साँस की तकलीफ है तो यह निमोनिया के लक्षण हो सकते हैंI 
  •  पेट के निचली हिस्सों में दर्द होनाI 
  • खांसी के साथ कई तरह के जैसे की हरा- पीला बलगम आनाI 
  • बच्चे में ठण्ड में भी खांसी के साथ -साथ पसीना आना या कभी अधिक ठण्ड भी लग सकता हैI 
  • बुजुर्गों में खासकर देखा गया है की निमोनिया से पीड़ित व्यक्ति की श्वासनली जाम होने के कारण मस्तिष्क को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन और अन्य पोषक तत्व से वंचित रह जाते हैं जिसके फलस्वरूप मतिभ्रम (confusion) की स्थितियां भी आ जाती हैI 
  • निमोनिया के प्रमुख कारण –

निमोनिया अनेक प्रकार से फैलता है यह वायरस ,बैक्टेरिया के कारण भी होती हैI इसमें बैक्टेरिया हवा के माध्यम से फैलते हैं,यह प्रभावित व्यक्ति के थूक ,खांसी ,बलगम ,छींक या सांस के संपर्क में आने से दूसरे व्यक्ति को भी हो जाता है

  • फॅंगस  और फ्लू के कारण  
  • एडीनो वायरस ,पैरा इन्फ्लुएंजा वायरस आदि के कारण हो सकते हैंI 
  •  यह मुख्यत: स्ट्रेटोपोकस नामक वायरस के  कारण होता है
  • इसका मुख्य कारण वायु-प्रदुषण को माना गया हैI
  • वायु में फैले कार्बनडाईऑक्साइड ,सीसा तथा अन्य रासायनिक तत्व लोगों के फेफड़े  धीरे-धीरे एक परत बनाती है जिससे ना सिर्फ निमोनिया बल्कि से सबंधित रोगों का कारण भी बनता हैI 
  • शिशुओं में प्रारम्भ में स्तनपान के अभाव के कारण भी निमोनिया हो सकता हैI 
  • ख़राब पोषण तथा अन्य रोग जैसे मधुमेह,सर्दी जैसे रोगों के कारण भी निमोनिया हो सकता हैI 
  • ध्रूमपान करना या उसके धुंए के चपेट में आने से
  • बच्चों को प्रदुषण ,धुल,ठंड के चपेट में आने से
  • शराब का  अत्याधिक सेवन करने सेI 
  • निमोनिया के प्रकार –

निमोनिया में निमोनिया में लक्षणों और कारणों  को देखते हुए अलग -अलग भागों में वर्गीकृत किया गया हैI

वायरल- वायरल निमोनिया अन्य  वायरस के सम्मिलित होने के कारण अधिक होता है, इसमें एंटीबायोटिक ट्रीटमेंट नहीं होता है क्योंकि इनके लक्षण अन्य  निमोनिया से भिन्न होते हैंI इन्फ्लुएंजा वायरस ,रिहनोवायरस,पारेनफ्लुएंजा आदि वायरस इसके प्रमुख कारक हैं I

फंगल –फंगल  स्वस्थ व्यक्तियों में नहीं हो सकता  यह अधिकतर दूषित वातावरण और अन्य रोगों के कारण  मुख्य रूप से फैलता हैI अगर आप पहले से ही किसी अन्य बीमारी से ग्रसित है तो फंगल निमोनिया होने की आशंका अधिक रहती हैI क्राईपटोकोस्कोसिस इन्फेक्शन ,ब्लास्टोमाइकोसिस इन्फेक्शन,एस्पेरगिलोसिस आदि इन्फेक्शन इसका प्रमुख कारक हैI

 बैक्टीरिया-निमोनिया मुख्य रूप से बैक्टीरिया के कारण होता हैI बैक्टीरियल  निमोनिया किसी भी उम्र में हो सकता हैI इसमें मरीज का शरीर कमजोर के कारण स्थिर हो जाता है और  मुख्य रूप से श्वास लेने में अधिक परेशानी इसी निमोनिया में ही होता हैI इसके शुरुआती लक्षण काफी सामान्य  होते हैं जैसे कि सर्दी ,खांसी , ठंड और बुखार लगना पर समय पर पहचान कर उपचार नहीं किया जाए तो यह काफी गंभीर बन जाता हैI शराब और ध्रूमपान का सेवन ,दूषित भोज्य पदार्थ क्लेबसीला जीवाणु ,हेमोफिलस जीवाणु आदि प्रमुख कारक हैI

  • निमोनिया में होने वाली प्रमुख जांचे और इलाज-

 आमतौर पर डॉक्टर  लक्षण देखकर ही निमोनिया के अनुमान लगा लेते हैं ,परन्तु जरूरतानुसार कुछ मुख्य रूप से जांच कराएं जाते है जैसे छाती  का X-RAY ,CBC (टोटल ब्लड काउंट) ,बलगम की जांच ,पेट का अल्ट्रासॉउन्ड की जाँच की आवश्यकता पड़ती हैI

लक्षणों और बिमारी के मुताबिक ,जांच के उपरान्त निमोनिया के उपचार किया जाता हैIबैक्टेरिया से होने वाले निमोनिया के लिए एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती है,वायरल से होने वाली निमोनिया में  दवा के साथ- साथ मुख्य रूप से शुद्ध भोजन ,डाइटिंग के अलावा आराम करने की हिदायत दी जाती है,वायरस से होने वाले निमोनिया पूर्ण रूप से स्वस्थ होने में थोड़ा समय लेता हैIइसके अलावा हलात को  उनकी BP ,रेस्पिरेटरी रेट को देखते हुए ऑक्सीजन आदि उपचार किया जाता हैI

  • निमोनिया से बचने का तरिका (घरेलू नुस्खे और उपचार )-
  • निमोनिया के बच्चों और बुजुर्गों के लिए काफी खतरनाक होता हैIइसलिए किसी तरह के सर्दी ,बुखार ,खांसी को हलके में न लें और तुरंत चिकित्सक से परामर्श लें I
  • सर्दी ,खांसी के दौरान  वातावरण में ना जाए ,जहाँ धूल-कण ,वाहनों का आवागमन ,ध्रूमपान करने वालों से दुरी बनाये रखें I
  • पेयजल की शुद्धि का ध्यान रखें यदि शक हो तो पानी को उबालकर पियें I
  • बच्चों को गन्दगी,अधिक ठण्ड ,धूल ,धुंए के बिच ना रखेंIउन्हें व्यक्तिगत साफ़ सफाई का पाठ पढ़ाएंI
  • ध्रूमपान और तम्बाकू से बिलकुल तौबा कर लेंI
  • ताज़ी सब्जियों और मौसमी फलों का सेवन करेंI
  • खुद की और अपने आस-पास की सफाई का ध्यान रखेंI
  • अधिक ठंडी भोजन न  करें I
  • बिमारी के दौरान कामकाज को छोड़कर भरपूर आराम करें और पूरी नींद अवश्य लेंI
  • अधिकतर पेय पदार्थ  जैसे की जूस ,नारियल पानी ,निम्बू का शरबत आदि का सेवन प्रतिदिन करें I
  • निमोनिया का टिका अवश्य लगवाएं ये किसी भी उम्र के लोगों को दी जा सकती  है I
  • नियमित रूप से व्यायाम करें और स्वस्थ आहार लेंI
  • नोट -इस लेख में उपरोक्त लिखी गई बातें अर्थात चिक्तिसकीय आलेख लोगों की  स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने बीमारी के बारे में अवगत कराने के लिए हैI  जो इलाज की पुष्टि नहीं करता हैI इसलिए उपरोक्त लिखी गए लक्षण होने पर से संपर्क करें और नियमित रूप से इलाज करवाएंI 

चिकनपॉक्स Chicken Pox – Symptom-लक्षण-cause-treatment-उपचार

 

  •  चिकनपॉक्स (CHICKEN-POX)

चिकनपॉक्स एक संक्रमण से  फैलने वाली बिमारी है, यह हमारे त्वचा को  प्रभावित करती है इस बीमारी के दौरान लाल-लाल चकते और दाने भी त्वचा पर आने लगते हैं I  छोटे बच्चे से लेकर बड़ों तक इसके वायरल के संपर्क में आ सकते हैं I खास कर छोटे बच्चों में इसका असर तेजी से देखने को मिलता है इसलिये उनके पालन-पोषण के गलत तरीके उन पर काफी भारी पड़ सकते हैं  इसलिए हमे उन्हें शारीरक ,मानसिक एवं शैक्षणिक विकास इस तरीके से करनी चाहिए जिसमें सही पोषण ,समय पर टीकाकरण ,बिमारियों का सही इलाज प्रमुख होI इसमें बुखार और पानी वाले छोटे- छोटे दाने साथ -साथ बुखार और उल्टियां भी आती हैं I चूँकि यह एक संक्रमणीय बीमारी है,जिससे किसी भी ऋतू और मौसम में चिकनपॉक्स हो सकते हैं परन्तु यह मॉनसून के समय अधिकांशत: होते हैंIइस बिमारी के दौरान सूखा खांसी और बदन में दर्द की भी समस्या भी होती हैIपुरे शरीर में दर्द और जलन होता हैI चिकनपॉक्स वेरिसेल्ला  जोस्टर नामक वायरस से फैलता हैI यह छूने से भी अधिक फैलता ही अर्थात महामारी की तरह खास कर भारत में जब आधुनिक चिकित्सा की नींव नहीं पड़ी थी तब यह महामारी हमेशा हजारों लोगों को जान ले लेता थाIइसे गाँव की बोल-चाल में छोटी माता भी कहा जाता हैI अगर इसके शुरुआती लक्षणों को जानकर उपचार न कराया जाये तो इस बिमारी का असर सीधा हमारे यकृत पर होता हैIयह अधिकांशत: एक बार हो जाने पर दुबारा कोई व्यक्ति चिकनपॉक्स के चपेट में नहीं आ सकता हैI इसमें जलयुक्त दाने शुरुआत में पेट और पीठ में दिखाई देते यही और उसके बाद पुरे शरीर में फ़ैल जाता हैI त्वचा के अधिक सवेंदनशील होने पर चिकनपॉक्स की आशंका अधिक बन जाती हैI यह कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को आसानी से अपने चपेट में ले लेता हैI चिकन पॉक्स के विषाणु में जब दवाओं की प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाती है तो उन पर प्रथम श्रेणी की उपचार प्रभावहीन हो जाता हैI जिससे चिकनपॉक्स गंभीर बिमारी का भयानक रूप ले लेता हैIइसलिए चिकनपॉक्स के लक्षणों को शुरुआती  समय पर पहचान करके सही समय पर इलाज करवाना बेहद ही जरुरी हैIइसका असर सात से दस दिनों तक काफी तीव्र रहता हैI चिकनपॉक्स से बचने के लिए हमेशा अपने घर की वस्तुओं ,स्वच्छ जल ,भोज्य पदार्थों से लेकर चारो तरफ के वातवरण स्वच्छ और शुद्ध रखेंI 

  • चिकनपॉक्स होने का मुख्य कारण क्या है?

यह बीमारी मुख्यत: दूषित पानी  और भोजन के सेवन करने से फैलता हैI परन्तु यह एक संक्रामक बीमारी है इसके फैलने के और भी कारण होते हैं

  • मौसम में आये अचानक बदलाव अर्थात अधिक ठण्ड या अधिक गर्मी में रहने से भी हवा में वेरीसल्ला जोस्टर नामक वायरस सक्रीय हो जाते हैं जिसके फलस्वरूप चिकनपॉक्स होने की आशंका बनी रहती हैI 
  • अत्याधिक देर तक स्नान करने से  या बाल ,त्वचा पर अधिक रासयनिक वाले साबुन और शैम्पू  लगाने से भी चिकनपॉक्स का वायरस फ़ैल सकता हैI 
  • शराब और ध्रूमपान करने से इसके अलावा जंक फ़ूड ,स्पाइसी फ़ूड ,तेलयुक्त ,कोल्ड ड्रिंक,चाइनीज फ़ूड और  बासी भोजन के सेवन करने से भी फैलता हैI 
  • यह वायरस से संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से भी फ़ैलता है ,रोगी के छींके हवा में फैलकर हवा को दूषित कर देता हैI 
  • चिकनपॉक्स का प्रमुख लक्षण
  •  तेज  बुखार के साथ -साथ पुरे शरीर  में विभिन्न आकार के लाल -लाल दाने एवं चकते निकलने लगते हैंI  
  • सिर दर्द और उल्टी होनाI 
  • सम्पूर्ण शरीर में दर्द और लाल -लाल दाने में मवाद और खुजली होनाI 
  • भूख कम लगना और आँखों  जलन होनाI 
  • दाने और चिकते मुख्यत: शुरुआत  पेट,पीठ से शुरू होकर पुरे शरीर में फ़ैल जाती है I 
  • गले में खराश  कभी -कभी गला में दर्द भी रहती हैI 
  • सीने में जकड़न होना I 
  • कमजोरी महसूस करनाI 
  • चिकन पॉक्स भले ही चमड़े की बीमारी हो पर वायरस से फैलने के कारण होता है और जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर तो वायरस शरीर के हर अंगों में पहुंचता है और प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर यह चमड़ी से मांस और हड्डी तक पहुंच जाता है गंभीर इन्फेक्शन और जख्म होने लगता हैI साथ ही साथ यह मस्तिष्क में पहुंच जाता है कभी -कभी और मस्तिष्क ज्वर का रूप ले लेता है ,जो काफी घातक होता है I 
  • उनके मुँह हमेशा सूखा महसूस करता है और डिहाईड्रेशन के लक्षण भी दिखाई देता हैI 
  • चिकनपॉक्स के इलाज एवं प्रक्रियाएं-

चिकनपॉक्स  से निजात पाने के लिए  आधुनिक समय में टीका और दवाईयां उपलब्ध हैI जिनकी आयु 12 महीने से अधिक हो वो सभी बच्चे ,व्यक्ति युवा अर्थात किसी भी उम्र के चेचक के पीड़ित  को उपचार के दौरान टीके लगाएं जाते हैंI एक बार चिकनपॉक्स का होने पर इसका असर 10 दिनों तक काफी तीव्र रहता हैI चिकनपॉक्स के दौरान साबुन के स्थान पर नीम के पते से  नहलवाया जाता हैI इसके बाद हल्दी या नीम का लेप भी लगाया जाता हैI डॉक्टर हमेशा आधुनिक उपकरणों जैसे मोबाइल,गैजेट्स,टेलीविज़न अदि का इस्तेमाल नहीं करने देते है ताकि स्क्रीन पर देखने से सिर में दर्द तेज ना हो I चिकनपॉक्स के मरीजों को खान- पान के विशेष ध्यान रखना पड़ता है उन्हें बाहरी और चटपटी  भोजन ना करने की सलाह दी जाती हैI इसके अलावा डेयरी प्रोडक्ट्स और मांसाहारी व्यंजनों का सेवन करना वर्जित हैI इसमें डॉक्टर दवा देने के साथ -साथ रोगी को अपने लाइफ स्टाइल को सुधारने का सलाह देते हैं जिसमें अपने दिनचर्या के क्रियाकलापों को करना ,सुबह समय से जागना ,समय से सोना ,प्रतिदिन व्यायाम और योग करना ,हमेशा साफ़ सफाई रखना आदि पर अधिक ध्यान देने को बताते हैंI चिकन पॉक्स की इलाज करने से पहले उनका अनेक प्रकार  जांचे भी होती है जिससे रोगी के शरीर में हुए परिवर्तनों के केस हिस्ट्री जानकारी मिलती हैIचुकी यह वायरल बीमारी है तो इसमें हमेशा दूसरे में फैलने न दें इसलिए चिकित्सक हमेशा आराम की सलाह देते हैं और इस बात पर विशेष ध्यान देते हैं की रोगी को पानी की मात्रा कमी न हो क्योंकि चेचक में बुखार के साथ डिहाइड्रेशन बहुत होता है I 

  • चिकनपॉक्स में होनेवाली घरेलु उपचार –

चुकीं यह वायरल बिमारी है इसमें पूर्वजों के द्वारा अध्यात्म के आधार पर कई क्रियाकलाप किया जाता है जो चिकित्सीय रूप से भी कारगर होते हैंIजैसे की इन मरीजों  को गर्मी अधिक लगता है तो उन्हें ठंडा भोजन और पेय पदार्थ भी दिया जाता हैI चूँकि आम बोल चाल में इसे छोटी माता कहा जाता है तो इसमें पूजा -पाठ के साथ-साथ नीम के पत्तियों (LEAVES)से स्नान भी कराया जाता है जो इन्फेक्शन से भी बचाता है इस तरह से  रोगी के लिए घरेलु उपचार काफी मददगार साबित होता है

  •  चिकन पॉक्स के बचाव के लिए इन बातों का रखें ध्यान  –   
  • चिकन पॉक्स से बचाव के लिए हमें अपने खान -पान के खाद्य पदार्थों को हमेशा स्वच्छ एवं शुद्ध रखना होगाI 
  • भीड़ वाली जगह पर अधिक उपस्थित न रहें I 
  • इस रोग से संक्रमित व्यक्ति से हमेशा दूर रहें I 
  • गुनगुने पानी से नहाएं 
  • अपने बच्चें को अधिक वर्षा वाले पानी में न भीगने दें ,हमेशा ठण्ड से बचाव करें I 
  • खुजली ,लाल -लाल दाने या चमड़े पर किसी भी प्रकार के विकृति होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें I 
  • चिकनपॉक्स का टिका जरूर  लगवाएंI 
  • प्रेग्नेंट औरतों को हमेशा प्रेग्नेंसी से पहले चिकनपॉक्स की जांच अवश्य  करवाएंI 
  • मरीज के आस -पास गन्दगी बिलकुल न हो I 
  • रोगी को प्रतिदिन स्नान करवाना चाहिए I 
  • नोट-उपरोक्त दी गयी जानकारियां पाठकों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से दी गयी हैIयह लेख आपको इलाज की पुष्टि नहीं करती इसलिए चिकन पॉक्स के  बताये गए लक्षण देखने को मिले तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से मिलें और उनकी बताई गयी परामर्शों को ईमानदारीपूर्वक पालन करेंI  

महिलाओं में बांझपन(infertility in Women)Symptom-लक्षण-cause-treatment-उपचार

  • महिलाओं में बांझपन(infertility in Womens) 

गर्भावस्था महिलाओं  के जीवन का सबसे ख़ुशी का क्षण होता हैI हर महिला को मां बनने की सपना होता है परंतु आधुनिक जीवन में महिलाओं के जीवन शैली में आएं कई बदलाव के कारण बांझपन की समस्या अधिक हो गई हैI लोगों का धारणा है कि कई महिला को गर्भाशय  की जन्मजात विकृतियां भी होती है और इस तरह के विकृतियों को लेकर कई महिलाओं को पहले बाँझपन का शिकार होना पड़ता था| लेकिन अब ठीक करने की तकनीक खोज ली गई है इससे महिलाएं मां बन सकती है जो किसी कारणवश नहीं बन पाती थी ,हर महिलाएं में अलग -अलग समस्याएं बांझपन की पायी जाती हैI कुछ महिलाएं में  गर्भाशय छोटा होता है तो कई महिलायें में गर्भाशय होता ही नहीं हैI छोटा गर्भाशयशय होने पर भी महिलाओं को गर्भधारण करने में काफी समस्या होती है उनके गर्भधारण करने के बाद भी बार-बार गर्भपात होने की आशंका बनी रहती हैI यह जानकर तोड़ी हैरानी होगी पर यह सत्य है की गर्भाशय न होने वाली महिलायें की पहचान 14 -15 वर्ष की उम्र में भी हो सकती हैI अगर नियमित इलाज और बांझपन  के बारे में विस्तार से जानकारी हो तो हम इसके कारण और समस्याएं और उसके उपाय को पहले ही जानकर महिलाएं बांझपन की समस्या से काफी हद तक अपने आप को बचा सकती हैंI

  • बाँझपन क्या है और इसके क्या -क्या कारण है ?

आधुनिक समय में बांझपन एक आम समस्या बन गयी है,जिसे निःसंतानता भी कहा जाता हैI बांझपन के  पुरुष और महिलाओं दोनों में अलग -अलग कारण हो सकता हैI महिलाओं में PCOS(POLYCYSTIC OVARY SYNDROME)एक सबसे बड़ा कारण है जो प्रजनन क्षमता की प्रक्रिया में अवरोध पैदा करता हैI यह महिलाओं के हार्मोन मात्रा में असंतुलन पैदा करता है ,इसके असंतुलन के कारण माहवारी(MENSTRUATION) की प्रक्रिया नियमित रूप से नहीं होती जो मां  बनने में अवरोध पैदा करता हैI POI के चपेट में आने से भी निर्धारित उम्र के पहले हीं मोनोपोज के तरफ जाने लग जाती हैंI मोनोपोज का अर्थ है की स्त्री-जीवन की वह अवस्था जब मासिक धर्म (menstruation) को रुके हुए काम से काम 9 -12 महीने से ऊपर हो गए होंI मोनोपोज महिला के जीवन में मासी और तारीख बदलाव ले कर आता हैIमोनोपोज के दौरान सेक्स से रूचि खत्म होने लगती है और उनकी योनि सूख-सी जाती हैIइसके अलावा कॅरियर  बनाने की चक्कर में लोग आजकल देर शादी करने की वजह से बच्चा होने में शारीरिक बदलाव एक बड़ी समस्या बनती जा रही हैIहमारे देश में महिलाओं के प्रजनन के लिए 20 से 30 वर्ष की उम्र काफी बेहतर होती हैI उसके बाद महिला के अण्डों में खराबी आने लगती हैIख़राब अंडो एवं स्पर्म से संतान पैदा करना बहुत ही मुश्किल हैI ऐसा होने पर सबसे पहले दवाओं के माध्यम से अंडो की गुणवत्ता बेहतर करने की कोशिश की जाती हैI 

  •  बाँझपन होने के प्रमुख कारण – 

बाँझपन होने के कई कारण हो सकते  हैं,इसलिए समय पर परीक्षण कराकर सुचारु रूप से नियमित इलाज करवाने की जरूर होती है

  • ट्यूबल इनफर्टिलिटी (TUBAL- INFERTILITY) यह गर्भाशय में सूजन या महिलाओं  में सेक्सुअल इन्फेक्शन के कारण होता है जिसके कारण शुक्राणु अंडे तक पहुंच नहीं पाते हैंI 
  • किसी अन्य रोग में की गयी सर्जरी के वजह से भी बांझपन की समस्या उतपन्न हो सकती हैI 
  • मोटापा और तनाव ,वैसे तो  मोटापा या अधिक वजन हर प्रकार के गंभीर बीमारयों का कारक होता है,परन्तु गर्भधारण में इसकी भूमिका अहम है मोटापा के वजह से हाइपरटेंशन और तनाव पैदा करता है जिससे पुरुष और महिलाओं दोनों को यौन सबंध बनाने की इच्छा नहीं होती हैI 
  • ध्रूमपान और शराब का सेवन करने से नशा हमें  शारीरिक और मानसिक दोनो ही माध्यम से कमजोर बना  देता हैIयह न सिर्फ अवसाद ,चिचिड़ापन पैदा करके डिप्रेशन की और ढकेलता है बल्कि शारीरक सबंध के प्रति रूचि ख़त्म हो जाती हैI 
  • तेल और मसालेयुक्त भोजन  के साथ-साथ अधिक गर्म और डब्बाबंद खाद्य पदार्थ के सेवन अगर नियमित और प्रचुर मात्रा में की जाए तो नपुंसकता भी हो सकती हैI 
  • एंडोमेट्रोसिस(ENDOMETRIOSIS) गर्भाशय से बाहर, गर्भाशय के ऊतकों की असमान्य रूप से वृद्धि होने के कारण  गर्भाशय ,अंडाशय ,अंडकोष और फैलोपीयन ट्यूब पर बुरा प्रभाव पड़ता है ,जिससे शुक्राणुओं का अंडे तक पहुंचने में बाधा उतपन्न होती हैI 
  • कोई गंभीर या लंबी बीमारी से ग्रसित होने के कारण भी महिलाओं में बांझपन की समस्या उतपन्न होती हैI
  • अधिक उम्र में शादी की वजह से पर्याप्त स्वास्थ्य अंडो की कमीI  
  • फैलोपीयन ट्यूब का ब्लॉक हो जानाI 
  • बांझपन में महिलाओं में दिखने वाली प्रमुख लक्षण-
  • अधिक उम्र में गर्भधारण से  शरीर के अंदरूनी भागों में समस्याएँ उतपन्न होनाI 
  •   ऐसे महिलाओं की सम्भोग से इच्छा ख़त्म हो जाती हैI 
  • आत्मविश्वास की कमी होना 
  • उदासी  और चिचिड़ापन 
  • हमेशा सिर और सम्पूर्ण शरीर में दर्द रहनाI 
  • शीघ्रपतन अर्थात सम्भोग करते समय जल्द ही डिस्चार्ज हो जानाI 
  • पीरियड्स का  नियमित समय पर ना आनाI  
  • महिलाओं की बांझपन में की जाने वाली प्रमुख जांचे-

डॉक्टर द्वारा  बाँझपन का सही कारण का पता लगाने के लिए अनेक प्रकार की अलग -अलग तरह की जांच की जाती हैI वर्तमान में छोटे गर्भाशय को बड़ा करने की तकनीक भी विकसित कर ली गयी है जीसके उपरांत  मूल वजहों को जानकर गर्भाशय बड़ा करने के बाद महिला में गर्भ धारण करने की क्षमता विकसित हो जाती हैI 

चिकित्सक द्वारा अल्ट्रासॉउन्ड से गर्भाशय की जांच की जाती है ताकि बिमारी का सही कारण पता चल जाता हैI इसके अलावा सोनोग्राफी ,दूरबीन जाँच ,बायोप्सी ,लैप्रोस्कोपी ,हिस्टेरोस्कोपी  प्रमुख तकनीक जांचें जांचे और उपचार की जाती हैI 

  • बाँझपन से बचने के लिए प्रमुख उपाय
  • स्पाइसी ,ऑयली और  जंक फ़ूड, रेडीमेड बजारु  खाना का सेवन न करें इन खाद्य पदार्थों की सेवन से प्रजनन क्षमता कम होती हैI 
  • शरीक रूप से तंदरुस्त और स्वस्थ रहना अर्थात किसी बीमारी से ग्रसित न रहनाI 
  • अपने उम्र के अनुसार वजन रखना अर्थात मोटापा के चपेट में ना आएं हमेशा शरीरीक क्रियाकलाप अधिक से अधिक करेंI 
  • नियमित व्यायाम और योग करना इससे शारीरिक बदलावों को काफी हद तक रोका जा सकता हैI शुरू से ही महिलाएं अगर योगाभ्यास करती हैं तो बहुत समय तक अपनी प्रजनन क्षमता को बरकरार रख सकती हैंI डॉक्टरों के अनुसार अधिकतर महिलाएं बांझपन के बारे में सोचकर बेहद कम समय में ही तनाव और अवसादग्रसित हो जाती हैंI तनाव कई समस्योओं की जननी है इसलिए योग  के माध्यम से तनाव को दूर कर प्रजनन संबंधी समस्याओं को काम किया जा सकता हैI 
  • संतुलित मात्रा में मौसमी फल और हरी सब्जियों का आहार लेनाI इससे  हमारी हमारी सम्पूर्ण अंग सुचारु रूप से सक्रीय रहते हैंI 
  • नशा और ध्रूमपान बिलकुल भी न करेंI 
  • अनियमित पीरियड्स या शरीर के अन्य  अंगों में विकार उत्पन्न हो तो तुरंत स्त्री विशेषज्ञ से संपर्क करेंI 
  •  नोट-  ऊपरोक्त  लिखी हुई तथ्य और बातें किसी  भी रूप से रोग के इलाज की पुष्टि नहीं करती यह  सिर्फ अपने पाठकों को जागरूक कर स्वस्थ और खुशहाल रखने के मकसद से  लिखा गया है I अगर आपको बाँझपन से जुड़े लक्षण दिखाई देते हैं जो ऊपर लिखी गयी हैं तो बिना चिंता और दबाव के तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और नियमित रूप से दवाईयां लेंI इस बीमारी का इलाज शुरुआती दौर में  पूर्ण रूप से संभव है इसलिए जितना जल्दी उपचार करवाएंगी उतना ही बेहतर परिणाम देखने को मिलेगाI 

 

 

 

Brain Stroke ब्रेन स्ट्रोक (मस्तिष्क का आघात) Symptom-लक्षण-cause-treatment-उपचार

 

  • Brain Stroke ब्रेन स्ट्रोक (मस्तिष्क का आघात)

मस्तिष्क  से जुडी प्रमुख बिमारियों में से एक है ब्रेन स्ट्रोक (Brain-stroke) मनुष्य की जीवनशैली पूरी तरह से प्रकृति के नियमों के विरुद्ध हो गयी ,लोगों की दिनचर्या में पूरी तरीके से परिवर्तन हो जाने के कारण अधिकतर  दिमागी रोग में तेजी से इजाफा हो रही हैI सुबह देर तक सोना ,रात को अधिक समय तक जागते रहना ,अनियमित और बाजार के अशुद्ध भोजन का सेवन ,व्यायाम और योग करने के बजाय दिन -रात मोबाइल ,कंप्यूटर ,गैजेट्स जैसे आधुनिक उपकरणों के साथ व्यस्त रहना आदि ऐसे क्रियाकलापों की वजह से तरह -तरह के रोग हो रहे हैंIहाल  ही में जारी किये गए आकड़ों के अनुसार केवल भारत में तीन व्यक्ति प्रति मिनट ब्रेन स्ट्रोक के शिकार हो जाते हैंIयह आंकड़ा तेजी से बढ़ रही है करीब 15 लाख भारतीय ब्रेन स्ट्रोक के शिकार हो रहे हैंI यह मुख्यत: 50 साल की उम्र के बाद हर औसतन हर छह में से एक पुरुष और हर पांच महिला में से एक महिला में ब्रेन स्ट्रोक के चपेट में आने का आशंका रहता हैIब्रेन स्ट्रोक एक गंभीर बीमारी है जिसका रिकवर  न होने पर व्यक्ति हमेशा के लिए अपंग या तो रोगी की मृत्यु हो जाती हैI यह अधिकतर इसलिए होता है की अभी भी 40 फीसदी लोग ऐसे हैं जिन्हे इस बिमारी (ब्रेन स्ट्रोक) के बारे में पता ही नहीं हैI अगर हमें सही जानकारी शुरुआती दिनों में ही मिल जाए तो 80 फ़ीसदी लोग इस गंभीर बीमारी से बच सकते हैं

  • ब्रेन स्ट्रोक क्या है?

जैसा कि हम सभी जानते हैं दिमाग ही हमारे जीवन की मुख्य अंग है , जो हमारे पूरे शरीर को नियंत्रित करता हैI  एक प्रकार के स्ट्रोक एक प्रकार के विकार है आकस्मिक रूप से हमारे मस्तिष्क किसी अन्य अंग की तरह ठहर जाता हैI  हमारे मस्तिष्क के धमनियां(arteries) में अवरोध आ जाती है जिसके कारण मस्तिष्क का एक भाग सुन्न (dead)हो जाता है, जिससे मरीज में अनेक प्रकार के अचानक से  विकार उत्पन्न होने लगते हैंI इसमें रोगी बोलने , देखने, चलने में भी असमर्थ हो सकता हैI ब्रेन स्ट्रोक से शरीर के किसी बॉडी फंक्शन का अचानक काम करना बंद कर देता हैI  इसमें उनका खून का परिसंचरण(प्रवाह)नहीं हो पाता है, जिसके कारण ऑक्सीजन(oxygen) और न्यूट्रिशन(nutrition) नहीं मिल पता है , जिसके कारण धीरे-धीरे हमारे दिमाग की कोशिकाएँ  मरने लगती हैI अगर व्यक्ति को तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया ना जाए तो रिकवरी (recovery)के चांस बहुत कम होते हैं और उसके दिमाग सुन पड़ जाते हैं या व्यक्ति की लकवा के अन्य लक्षण  दिखाई देते हैं जिससे वह जीवित रखकर भी मृत की तरह केवल लाश बनकर रह जाता है इसलिए इसका इलाज लक्षणों को जान कर तुरंत ही करवाना चाहिएI हृदयाघात(हार्ट -अटैक) के लक्षणों की तरह बेन स्ट्रोक के लक्षण नहीं होते यह  हमारे ब्रेन के किसी भी हिस्से को प्रवाहित कर सकता हैI 

  • ब्रेन स्ट्रोक कितने  प्रकार के होते हैं?

 ब्रेन स्ट्रोक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं

(1) इस्कीमिक स्ट्रोक (Ischemic -stroke) (2)हैमरेजिंग स्ट्रोक (Hemmorrhage stroke)

इस्कीमिक स्ट्रोक -इसमें ब्लड सप्लाई रुक जाती है ,कभी दिमाग में खून जम जाती है  इसमें रक्त प्रवाह में अत्याधिक कमी हो जाती है या किसी ऐसा खून का झटका जो  कहीं बाहरी अंगों दिल या किसी अन्य नसों में बना होता है वो दिमाग तक पहुंच जाता है जिसकी वजह से नस block हो जाती हैI 

हैमरेजिंग स्ट्रोक – इसमें खून की धमनियां (Arteries) फट जाती है, जिसके कारण रक्तस्राव (Bleeding) होने लगती है जिसके कारण ऑक्सीजन और पोषक तत्व से रोगी वंचित हो जाता हैI इससे दिमाग(BRAIN) में खून एकत्रित हो जाने से दबाव brain tissuses पर पड़ती है जो हमारे दिमाग को क्षतिग्रस्त करता है I

          इसके अलावा एक मिनी स्ट्रोक भी होता है, जिसे TIA(Transient ischemic Attack ) कहते हैंIयह भी एक प्रकार के ब्रेन स्ट्रोक है इसमें जो लक्षण आते हैं वह 24 घंटे के अंदर ही ठीक हो जाते हैं अर्थात यह समान्य स्ट्रोक हैI मस्तिष्क  के किसी हिस्से में थोड़े समय के लिए ही रक्त आपूर्ति में कमी हो जाती है तब इसकी स्थिति उत्पन्न होती हैI जिस रोगी को TIA स्ट्रोक आता है उन्हें समय-समय पर नियमित रूप से जांच करवाने की जरूरत होती है वरना यह भी गंभीर बन सकता हैI

  • ब्रेन स्ट्रोक के प्रमुख लक्षण-(SYMPTOMS)

जब ब्रेन स्ट्रोक आता है तो यह शरीर के किसी अंग को भी  प्रभावित करता हैIब्रेन स्ट्रोक से प्रभावित व्यक्ति की उनके बॉडी बैलेंस, आंखें ,चेहरा ,हाथ, बोलने का तरीका इन सब को लेकर तुरंत इलाज होना जरूरी हैI  

  • किसी व्यक्ति को खुद को बैलेंस  करने या खड़े होने में दिक्कत हो तो यह स्ट्रोक के लक्षण हो सकते हैंI 
  •  बोलते बोलते आवाज बंद हो जाना
  •  अपनी इच्छा से और के हाथ पैर हिलाने में में भी असमर्थ हो जाता हैI 
  •  स्ट्रोक से चेहरे की मांसपेशियां कमजोर हो जाती है जिससे लार बहने लगती हैI 
  •  आंखों से अचानक दिखना बंद हो जाता हैI 
  •  अचानक सिर घूमने लगे या चक्कर आने लगता हैI 
  •  सुन्न पड़ना या झुनझुनी स्ट्रोक के समान्य लक्षण में से एक हैI 
  • स्ट्रोक की वजह से सांस लेने में तकलीफ हो सकती हैI 
  •  मरीज बेहोश भी हो जाता हैI 
  • लगातार सिर में चक्कर आना और उल्टी महसूस होनाI
  •  जुबान का लड़खड़ाना I 
  • ब्रेन स्ट्रोक के दौरान होने वाली प्रमुख जांचें-

ब्रेन स्ट्रोक  से ग्रसित रोगियों का पता लगाने के लिए विभिन्न प्रकार के समय-समय पर जांच होती रहती है जिसमें  सीटी स्कैन, एम आर आई, अल्ट्रासाउंड, सेरेब्रल एंजियोग्राम,आदि जैसे टेस्ट चिक्तिसकों द्वारा किये जाते हैं I 

  • ब्रेन स्ट्रोक से ग्रसित होने का मुख्य कारण –

बिगड़ती जीवन शैली अनियमित खानपान और आलस्यपन के साथ -साथ नशा उत्पादों ने  लोगों की जिंदगी रोगों से भर दिया हैI ब्रेन स्ट्रोक के रोगी भी इन्हीं कारणों की वजह से तेजी से बढ़ रहे हैंI 

  • लंबे समय तक  नशा करने और ड्रग्स लेने से शरीर के विभिन्न अंगों पर असर पड़ता है  ब्रेन स्ट्रोक के मुख्य कारणों में से एक हैI 
  • यह  हाइपरटेंशन अर्थात उच्च रक्तचाप के कारण भी  होता हैI 
  • अनियमित जीवन शैली और शारीरिक परिश्रम में कमी 
  •  अधिक सोच और तनाव के कारण भी ब्रेन स्ट्रोक हो सकते हैं I 
  • संतुलित आहार ना  लेना, अधिक मोटापा के कारण 
  • लम्बे समय तक काम करनाI 
  • ब्रेन स्ट्रोक से बचने का उपाय –

कुछ घरेलु नुस्खों और सावधानियां बरतने से इस रोग से हमेशा बचा रह सकते हैं

  • हमेशा ताजा और संतुलित आहार लें
  •  नियमित रूप से योग एवं व्यायाम करें
  • खट्टे फल जरूर ले जैसे नींबू ,अंगूर, संतरा जैसे फल फायदेमंद होते हैंI  जो प्रतिरोधी क्षमता को भी ठीक करता हैI 
  •   शराब और ध्रूमपान का सेवन  न करेंI 
  •  स्वास्थ्य को अनदेखी करने से बचें कथा छोटे-छोटे विकार उत्पन्न होने पर किसी अच्छे डॉक्टर से नियमित जांच करवाएं
  • बिना चिकित्सक  सलाह के मस्तिक से संबंधित दर्द  का दवा न लेंI 
  • 40 वर्ष के उम्र के बाद  नियमित रूप से शरीर की जांच करवाएं I 
  • मोटापा कम करें अगर आपका वजन ज्यादा है तो अधिक से अधिक डाइट प्लान और व्यायाम से मोटापा कम करने की कोशिश करेंI 
  •  अगर आपको  उच्च रक्तचाप और डायबिटीज  की बीमारी है तो रक्त को हमेशा को हमेशा  समान्य और शूगर नियंत्रित रखेंI 
  •  ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन करें जिसमें कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम और फाइबर युक्त  भोज्य पदार्थ होI 
  •  नियमित रूप से प्रतिदिन इन 4 लीटर पानी पियें  और मौसमी सब्जियों,फलों वह अपने आहार में जरूर शामिल करेंI 
  • नोट-  ऊपरोक्त  लिखी हुई तथ्य और बातें किसी  भी रूप से रोग के इलाज की पुष्टि नहीं करती यह  सिर्फ अपने पाठकों को जागरूक कर स्वस्थ और खुशहाल रखने के मकसद से  लिखा गया है I ब्रेन स्ट्रोक एक ऐसी बीमारी है जिसमें व्यक्ति की मौत हो सकती है या फिर रिकवर होकर सामान्य जीवन भी जी सकता है, इसलिए उपरोक्त लिखी गयी लक्षण दिखाई देने पर  तुरंत विशेषज्ञ न्यूरोसर्जन के पास जाकर सलाह अवश्य लेंI 

  

फेफड़े का कैंसर (Lungs Cancer ) Symptom-लक्षण-cause-treatment-उपचार

 

  • फेफड़े का कैंसर (Lungs Cancer )

विश्व स्वास्थ्य संगठन  के आंकड़े से यह जाहिर होता है कि दुनिया भर में फेफड़े का कैंसर की बीमारी तेजी से फैल रही हैI यह युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक को अपनी चपेट में ले रहा हैI  डब्ल्यूएचओ के आंकड़े के अनुसार दुनिया भर में 76 लाख से अधिक लोग प्रत्येक साल फेफड़े के कैंसर के शिकार हो रहे हैं , इसका मुख्य कारण ध्रूमपान करना है| विशेषकर सिगरेट पीने से अधिकतम लोग  तेजी से फेफड़े के चपेट में आ रहे हैं| चिकित्सकों के अनुसार मानो तो पहले यह कैंसर केवल पुरुषों में पाया जाता था परंतु इन दिनों यह बीमारी महिलाओं में भी तेजी से फैल गई है जो गंभीर चिंता का विषय है ऐसा नहीं की यह  सिर्फ धूम्रपान करने से फैलता है बल्कि एक अध्ययन और सर्वे के अनुसार पाया गया की लगभग 25 फीसदी ऐसे मरीज थे जो धूम्रपान न करने के बावजूद फेफड़े के कैंसर से पीड़ित थे और उनकी उम्र 50 साल से भी कम थी| यह गंभीर चिंता का विषय है सही मायने में जानकारी प्राप्त कर अगर हम शुरुआत में ही सावधानी बरतें तो इस गंभीर बीमारी के चपेट में आने से हमेशा के लिए बचे रह सकते हैं और लोगों को भी इस बीमारी के प्रति सावधान किया जा सकता है जिससे हमारे देश में स्वस्थ और समृद्धि बने रहे|

  • फेफड़े का कैंसर क्या है?

 कैंसर का  वह प्रकार ,जो फेफड़े को प्रभावित करता है अर्थात कैंसर का विकार फेफड़ों में शुरू होता है|हमारे शरीर में दो फेफड़े होते हैं ,यह छाती के दायीं और बायीं ओर होती है |फेफड़े के कारण ही हमारे शरीर के अंदर खून में ऑक्सीजन का सक्रीय रूप से संचरण होता है और अशुद्ध गैस और कार्बनडाईऑक्साइड को बाहर निकालता है जिससे हमारे स्वस्थ जीवन की प्रक्रिया सुचारु रूप से चलता है|   फेफड़े का कैंसर को साइलेंट किलर भी कहा जाता है किसी कारण हमारे फेफड़ों में असामान्य कोशिकाओं के संख्या में वृद्धि हो जाती है जिससे अंगों में अनेक परिवर्तन हो कर के कोशिकाओं के बढ़ने के कारण फेफड़ों में गाँठनुमा आकृति बनने लगता है तो वह फेफड़ों में कैंसर का रूप ले लेता है |यह मुख्यत : 50 वर्ष के अधिक आयु वाले लोग  इस रोग से ग्रसित होते हैं| यह रोग जानलेवा होने के साथ-साथ इसका इलाज भी बहुत महंगा होता है|

  • फेफड़े का कैंसर कैसे होता है?(मुख्य कारण )-

आज के दौर में समाज और मानव की जीवन शैली में बदलाव होने के कारण,मनमानी ढंग से  जीने की वजह से गंभीर रोगों की संख्या में वृद्धि हो रही है| फेफड़े का कैंसर गंभीर एवं जानलेवा बीमारियों में से एक है| इसका मुख्य कारण वायु प्रदूषण  है, वायु में फैले कार्बन डाइऑक्साइड, सीसा और अन्य रसायनिक तत्व लोगों के फेफड़ों में धीरे -धीरे एक परत बनते है जो बीमारी का कारण बनता है|

  •  सामान्यत:  किसी भी प्रकार के धूम्रपान करने से फेफड़े के कैंसर का मुख्य कारण है सिगरेट और तंबाकू दो ऐसे कारक हैं जो न सिर्फ फेफड़े बल्कि जबड़े अमाशय, आंख और मुद्रा से का कैंसर पैदा कर सकते हैं  धूम्रपान का आशय सिर्फ सिगरेट और गुटका ही नहीं बल्कि किसी भी प्रकार की नशा चाहे वह गांजा ,बीड़ी ,गुटका और अनेक प्रकार की तंबाकू किसी भी रूप में ली जा रही हो कैंसर सही अनेक रोगों को पैदा कर सकती है क्योंकि तंबाकू में 18 जानलेवा रसायन होते हैं जो हमारे शरीर को पूरी तरीके से खोखला कर देता हैI  जिससे मन्युष्य का जीवन नरकीय हो जाता है|
  • किसी भी प्रकार के कारखाना ,औद्योगिक क्षेत्रों में काम करते है तो उसके कारण भी फेफड़े का कैंसर हो सकते हैं क्यूंकि हमारी वातवरण में कारखानों से निकले विषैली रासायनिक गैस की मात्रा मानकों से कई गुना ज्यादा बढ़ जाने के कारण हमारे जलवायु दूषित हो रहे हैं |
  • भोजन -सामग्री के लिए   नए उपकरणों के इस्तेमाल जैसे रेफ्रिजरेटर , मइक्रोओवन  आदि ऐसे उपकरण जिसमें खाद्य पदार्थ रखे जाते हैं तो हमारे भोजन में उन उपकरणों से निकलने वाली रासायनिक गैसों का मिश्रण हमारे भोजन में हो जाता है जिसके बाद उस  भोजन को सेवन करने से भी हमे फेफड़ों का कैंसर हो सकता है |
  • आधुनिक गाड़ियों के अत्याधिक इस्तेमाल से या वैसे जगह पर दैनिक जीवन बिताने से जहाँ हमेशा यातयात का परिचालन हो उससे भी हमे फेफड़ों का कैंसर होने की संभावना बनी रहती है|वाहनों से   निकले विषैली धुंआ और गैस की वजह से हमारे वातवरण तेजी से प्रदूषित हो रहे हैं |
  •  मोबाइल,गैजेट्स आदि  ऐसे अनेक प्रकार के उपकरण जिनसे रेडिएशन तेजी से  फैलता है उसके कारण भी फेफड़े का कैंसर हो सकता है|
  • कई फेफड़ों से सबंधित अन्य बिमारियों की वजह से भी हो सकता है |
  • इस कैंसर का प्रकार –

डॉक्टरों ने मुख्य रूप से कैंसर को दो भागों में विभाजित किया है अर्थात फेफड़े का  कैंसर दो प्रकार के होते हैं-(1)small cell cancer(लघु कोशिका कैंसर) (2)non-samll cancer (गैर लघु-कोशिका कैंसर)

  (1 )लघु कोशिका कैंसर -यह  कैंसर बहुत ही तेजी से शरीर में फैलता है इसमें कोशिकाओं की संख्या कई गुना तेजी से बढ़ता है| 

(2)गैर लघु कोशिका कैंसर –इस कैंसर में कोशिकाएं  बढ़ती तो है परंतु बहुत ही कम संख्या में इस प्रकार के कैंसर में  शुरुआती दौर में पता चल जाए तो यथाशीघ्र स्वस्थ हो सकता हैI 

  • फेफड़ों की कैंसर की कितनी स्टेज होती है?

फेफड़े का  कैंसर को डॉक्टरों द्वारा TNM के आधार पर स्टेजेस की वर्गीकृत किया जाता है I जहाँ T का अर्थ=ट्यूमर  इसमें ट्यूमर की आकृति देखि जाती हैI N का अर्थ=निम्फनोट्स जिसमे ग्रंथियों की अवस्था देखि जाती हैI M का अर्थ=मेटास्टेसिस जिसमें ट्यूमर के शरीर के विभिन्न अंगों में फैला है की नहीं यह पता लगता हैI 

यह मुख्यत: TNM के आधार पर  4 स्टेजेस में विभाजित किया गया हैI 

  • स्टेज-1(ST-1)- इस अवस्था में ट्यूमर फेफड़े के अंदर सिमित दायरे तक ही सिमित रहते हैं यह सबसे शुरुआती स्टेज होता है जिसमें सर्जरी द्वारा उपचार  किया जाता हैI 
  • ST-2-  इन्हें भी सर्जरी से उपचार किया जा सकता हैI 
  • ST-3 – इस अवस्था को  डॉक्टरों ने दो श्रेणी में बांटा  है पहली श्रेणी में ट्यूमर हमारे छाती के बीच वाले ग्रंथि में आ जाता है उसमें कीमोथेरपी के बाद ऑपरेशन किया जाता है और ट्यूमर को निकला जाता हैI 

                                  इसकी दूसरी  श्रेणी की बात की जाए तो फेफड़े के ग्रंथि के दूसरे भाग में आ पहुंचता है इस स्टेज में केवल कीमोथेरपी और रेडियोथेरेपी से उपचार किया  जाता है इसमें रोगी को पूर्ण रूप से स्वस्थ होने की संभावना क्षीण(कम ) हो जाती हैI 

  • ST-4-यह कैंसर की अंतिम अवस्था होता है जिसमें कैंसर छाती से होते हुए पुरे शरीर में फैल जाता है जिसमें रोगी को  कीमोथेरेपी के द्वारा ही उपचार किया जा सकता हैIइस स्टेज में मरीज के ठीक होने की गुंजाइश नहीं होती हैI  
  • फेफड़े के कैंसर का मुख्य लक्षण-

फेफड़े का कैंसर भारत में बहुत अधिक होता है क्योंकि हमारे यहां तंबाकू ,बीड़ी ,सिगरेट खैनी, गुटखा और पान मसाले जैसे नशीली चीजों का लोग बहुत करते हैंI इसके स्क्रीनिंग के दौरान मुख्य लक्षण और बातों पर ध्यान देते हैं जो निम्न है-

  • छाती में दर्द होना 
  • खांसी और अनेक रंग के बलगम आना ,खून आना 
  • फेफड़े में हमेशा कफ का अभास होना
  • सांस फूलना और हांफ आना 
  • शरीर के जोड़ों में दर्द रहना
  • बार -बार गला बैठ जाना 
  • थोड़ी देर चलने पर ही थकान महसूस होना
  • लगातार या कभी -कभी सिर में दर्द महसूस होना 
  • बुखार और ऊर्जाहीन,कमजोरी  महसूस करना 
  • तेजी से वजन काम होना 
  • भूख कम लगनाI 
  •   फेफड़े के कैंसर में किए जाने वाले प्रमुख जांच

फेफड़ों के  कैंसर को पता लगाने के लिए डॉक्टर द्वारा अनेक प्रकार के जांच करवाई जाती हैI इसके जाँच के लिए X-RAY ,ब्रोंकोस्कोप ,खून की जांच ,सिटी स्कैन ,बायोप्सी ,सीने का रेडियोग्राफ  आदि कराई जाती है I 

  • फेफड़े के कैंसर से  बचने का उपाय-

यदि फेफड़ों  किसी प्रकार के समस्या हो और इलाज कराते हुए 4 महीने से अधिक समय बीत चुका हो  तो छाती के एक्सरे जरूर करवाएंI  फेफड़ों के मामले में कोई अच्छे से सर्जन से इलाज करवाएं I निचे दी गयी बातों को अपने दिनचर्या में शामिल कर हमेशा इस खतरनाक बीमरी से  सुरक्षित रह सकते हैंI

  • ध्रूमपान का सेवन कतई न करें 
  • हमेशा शुद्ध भोजन करें जो मौसम के अनुकूल हो 
  • फाइबरयुक्त पात्रों या बर्तन में गर्म भोजन न करें 
  • ताज़ी सब्जियों का सेवन करें 
  • मौसमी फलों का सेवन करें 
  • जहँ ध्रूमपान हो या अधिक कल -कारखानें और वाहनों का अवागमन हो उस स्थल से हमेशा दुरी बनाये रखेंI 
  • बाहर जाते समय हमेशा मुंह और नाक ढँक कर जाएँI 
  • नियमित व्यायाम और योग करें I 
  • नोट- ऊपर दिए गए पूरी जानकारी डॉक्टरों  के बातचीत और किताबों के अध्ययन के आधार पर दी गयी है I जो रोगी को पूर्ण रूप से स्वस्थ और लाभ होने की पुष्टि नही करता है ,हमारा मकसद सिर्फ आपको जागरूक कर अपने स्वास्थ्य के पार्टी सचेत करना है,ताकि आप सपरिवार स्वस्थ और खुशहाल जीवन बिता सकें I 

फेफड़े में जरा भी समस्या आये या ऊपर लिखी गयी   लक्षण होने पर डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें और उनकी परामर्श को ईमानदारी पूर्वक पालन करें I